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अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages

Page 353 of 405

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Page 353

३४६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

भ्रमभूतम्, इदम्, सर्वम्, किञ्चित्, न, अस्ति, इति,
निश्चयी, अलक्ष्यस्फुरणः शुद्धः, स्वभावेन, एव, शाम्यति ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
इदम्=यहशुद्धः=शुद्ध
सर्वम्=सबनिश्चयी=निश्चय करनेवाला
भ्रमभूतम्=प्रपञ्चस्वभावेन=स्वभाव से
किञ्चित्=कुछएव=हि
न अस्ति=नहीं हैशाम्यति= शान्ति को प्राप्त होता है ॥
इति=ऐसा
अलक्ष्यस्फुरण=चैतन्यात्मानुभवी

भावार्थ ।

**प्रश्न—**अनर्थ की शान्ति के लिये प्रयत्न करना चाहिये ?

**उत्तर—**अधिष्ठान के साक्षात्कार होने पर यह संपूर्ण जगत् भ्रम करके ही कल्पित प्रतीत होता है। वास्तव में कुछ भी सत्य प्रतीत नहीं होता है। जिस पुरुष को ऐसा ज्ञान है, वह कुछ भी प्रयत्न नहीं करता है। क्योंकि वह स्वभाव करके ही शान्तरूप है। शान्ति के लिये फिर उसको कुछ भी कर्तव्य बाकी नहीं रहता है ॥ ७० ॥

मूलम् ।

शुद्धस्फुरणरूपस्य दृश्य भावमपश्यतः ।
क्व विधि क्व च वैराग्यं क्व त्यागः क्व शमोऽपि वा ॥ ७१ ॥