अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
by महर्षि अष्टावक्र
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished405 pages
Page 351 of 405
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३४४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
बहुना, अत्र, किम्, उक्तेन, ज्ञाततत्त्वः, महाशयः, भोग-
मोक्षनिराकाङ्क्षी, सदा, सर्वत्र, नीरसः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अत्र = | इसमें | भोगमोक्षनिरा- <br> काङ्क्षी = | $\left.\begin{aligned} \text{} \ \text{} \end{aligned}\right}$ भोग और मोक्ष की <br> आकांक्षा का त्यागी |
| बहुना = | बहुत | महाशयः = | ज्ञानी |
| उक्तेन = | कहने से | सदा = | सदैव |
| किम् = | क्या प्रयोजन है | सर्वत्र = | सर्वत्र |
| ज्ञाततत्त्वः = | तत्त्व जाननेवाला | नीरसः = | राग-द्वेष रहित है ॥ |
भावार्थ ।
हे जनक ! जो विद्वान् ज्ञाततत्व है, अर्थात् जिस विद्वान्
ने आत्मतत्त्व को जान लिया है, उसी का नाम ज्ञाततत्त्व
है। क्योंकि वह भोग और मोक्ष दोनों में निराकांक्षी है,
आकांक्षा से रहित है। अर्थात् दोनों में राग द्वेष से रहित
है ॥ ६८ ॥
मूलम् ।
महदादि जगद्वैतं नाममात्रविजृम्भितम् ।
विहाय शुद्धबोधस्य किं कृत्यमवशिष्यते ॥ ६९ ॥
पदच्छेदः ।
महदादि, जगत्, द्वैतम्, नाममात्रविजृम्भितम्, विहाय,
शुद्धबोधस्य, किम्, कृत्यम्, अवशिष्यते ॥