अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
by महर्षि अष्टावक्र
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished405 pages
Page 299 of 405
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२९२ अष्टावक्र गीता भा० टी० स०
को करता है। जिसको कोई विक्षेप नहीं रहा है, वह
विक्षेप के दूर करने के लिये चित्त का निरोध भी नहीं करता
है ॥ १७ ॥
मूलम् ।
धीरो लोकविपर्यस्तो वर्त्तमानोऽपि लोकवत् ।
न समाधिं न विक्षेपं न लेपं स्वस्य पश्यति ॥ १८ ॥
पदच्छेदः ।
धीरः, लाकविपर्यस्तः, वर्तमानः, अति, लोकवत्, न,
समाधिम्, न, विक्षेपम्, न, लेपम्, स्वस्य, पश्यति ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| धीरः = ज्ञानी पुरुष | समाधिम् = समाधि को |
| लोकविपर्यस्तः = { लोक में विक्षेप- / रहित हुआ | न = न |
| च = और | विक्षेपम् = विक्षेप को |
| लोकवत् = लोक की तरह | च = और |
| वर्त्तमानः अपि = वर्त्तता हुआ भी | न = न |
| न = न | लेपम् = न बंधन को |
| स्वस्य = अपने | पश्यति = देखता है ॥ |
भावार्थ ।
जो विद्वान् है, वह लोकों में विक्षेप से रहित होकर
प्रारब्धवशात् लोकों में रह करके बाधिता अनुवृत्ति करके
व्यवहार को करता भी अपने आत्मा में निर्लेप स्थित है।
क्योंकि न वह समाधि करता है, और न विक्षेप को प्राप्त
होता है ॥ १८ ॥