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अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages

Page 298 of 405

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Page 298

अठारहवाँ प्रकरण । २९१

देखा है, उसी को ऐसा अनुभव है "अहं ब्रह्म" मैं ब्रह्म हूँ ।
को सारा जगत् ब्रह्म-रूप दिखाई देता है, और वह सर्व
चिंता से रहित होकर कुछ भी चिन्तन नहीं करता है।
और जो ब्रह्म का चिंतन है कि मैं ब्रह्म हूँ, उसको भी वह
अभ्यास नहीं करता है ॥ १६ ॥

मूलम् ।
दृष्टो येनात्मविक्षेपो निरोधं कुरुते त्वसौ ।
उदारस्तु न विक्षिप्तःसाध्याभावात्करोति किम् ॥१७॥

पदच्छेदः ।
दृष्टः, येन, आत्मविक्षेपः, निरोधम्, कुरुते, तु, असौ,
उदारः, तु, न, विक्षिप्तः, साध्याभावात्, करोति, किम् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
येन=जिस पुरुष द्वारा<br>आत्मविक्षेपः=आत्मा में विक्षेप<br>दृष्टः=देखा गया है<br>असौ=वह पुरुष<br>निरोधम्=चित्त के निरोध को<br>करोति=करता है<br>तु=परन्तु<br>उदारः=ज्ञानी पुरुषतु=तो<br>न विक्षिप्तः=विक्षेप रहित है<br>+ अतः एव=इसलिये<br>साध्याभावात् = साध्य के अभाव होने के कारण<br>सः=वह<br>किम्=क्या<br>करोति=करेगा अर्थात् कुछ भी न करेगा ॥

भावार्थ ।
जिस पुरुष ने अपने में विक्षेपों को देखा है, वही
विक्षेपों के दूर करने के लिये चित्त के निरोध की चिंता