अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ एवं मंगलाचरण
THE
HARIDAS SANSKRIT GRANTHAMALA
228
श्रीलौगाक्षिभास्करप्रणीतः
अर्थसंग्रहः
त्यागमूर्ति श्रोटाटाम्बरिस्वामिना
‘दीपिका’ हिन्दीटीकया समलङ्कृतः
न्याय-व्याकरणाचार्य-लब्धस्वर्णपदक-
पण्डित श्रीशोभितमिश्रेण सम्पादितः
THE
CHOWKHAMBA SANSKRIT SERIES OFFICE
VARANASI-1 ( India )
प्रकाशक : चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी-१
मुद्रक : विद्याविलास प्रेस, वाराणसी-१
संस्करण : द्वितीय, वि० सं० २०२१
मूल्य : १-२५
© Chowkhamba Sanskrit Series Office,
P. O. Box 8, Varanasi.
( INDIA )
Phone : 3145
प्रस्तावना
प्रत्येक प्राणी स्वभावतः सुखप्राप्ति के लिये अनवरत कुछ न कुछ प्रयास
करता रहता है । वस्तुतः सुख प्राप्त करना ही जीवन का परम उद्देश्य समझा
जाता है, इसमें किसी का भी मतभेद नहीं है। परन्तु उसके सामने यह एक
जटिल प्रश्न उठ खड़ा होता है कि वह सुख कैसे प्राप्त हो ? इसी के समाधान
को दृष्टिकोण में रखते हुए महान आचार्यों ने कर्म के साथ-साथ उसके साधनों
की जानकारी प्राप्त करना ही परम उपाय बतलाया है । उनमें भी ज्ञान के
साथ कर्म का इतना गहरा सम्बन्ध है कि एक के बिना दूसरे का सफल होना
असम्भव है ; ऐसा कहें तो कोई अत्युक्ति न होगी। इसीलिये जगन्नियन्ता परम-
पिता प्रभु ने नानाविध विचित्र विश्वसर्जन कर्म कौशल को दर्शाते हुए विश्व को
ही कर्ममय एवं ज्ञानमय करने की भावना से कर्म-ज्ञान के भण्डार वेद को ही
अपना एक प्रतीक स्थापित किया है। उसी प्रभु की प्रेरणात्मक आज्ञा को वहन
करते हुए महर्षि भगवान् जैमिनि ने कर्मप्रधान जगत् में प्राणिमात्र के कल्याणार्थ
ऐहिकामुष्मिक उद्देश्यों के परम साधनभूत उत्तम कर्मों में प्रवृत्ति कराने की भावना
से प्रेरित होकर मानवों को वेदार्थतत्त्वों की जानकारी प्राप्त कराने के लिये कर्म-
काण्डप्रधान मीमांसा शास्त्र का द्वादश अध्यायों में निर्माण किया। उसी को
पूर्वमीमांसा या कर्ममीमांसा कहते हैं । उससे वेदों के वास्तविक अर्थतत्त्वों का
ज्ञान अच्छी तरह होता है । किन्तु उसमें अत्यन्त विशाल रूप से प्रतिपादित
जटिलतम कर्मकलापों का ज्ञान कराने में समर्थ किसी सरलतम ग्रंथ को नहीं
देखकर महामहोपाध्याय लौगाक्षि भास्कराचार्य ने उक्त मीमांसा शास्त्र में प्रवेश
कराने के लिये सभी वैदिक यज्ञ-सम्बन्धी पदार्थों का संक्षेप में संग्रह कर ‘अर्थ-
संग्रह’ नाम का ग्रन्थ बनाया। मीमांसा का सारभूत यह ग्रन्थ छोटा होने पर
भी कितना उपादेय है यह विषय प्रायः किसी से छिपा नहीं है। अतएव प्रत्येक
प्रान्त की संस्कृत परीक्षा में भी यह ग्रन्थ तत्तत्प्रान्तीय शिक्षासमिति द्वारा पाठ्य
पुस्तकों में निर्धारित किया गया है।
स्वतन्त्र भारत की वाणी ( हिन्दी ) से सुसज्जित होकर यह पुस्तक आज
प्रथम बार राष्ट्रभाषा का अभिनन्दन करने जा रही है-यह एक महान हर्ष का
विषय है, क्योंकि इसमें बहुत से ऐसे पारिभाषिक शब्द आ गये हैं, जिनके पूर्वापर
सम्बन्ध के साथ वास्तविक भावार्थों को एक सरल एवं ठोस रूप में जानने के
[ २ ]
लिये छात्रगणों को बहुत ही दिनों से बड़ी ही उत्कण्ठा बनी हुई थी । यद्यपि
इसकी बहुत सी संस्कृत टीकायें प्रकाशित हो चुकी हैं तथापि अल्प समय में
अत्यन्त सरल उपाय से विद्यार्थियों को समझाने के लिये वे अपर्याप्त ही मालुम
पड़ती थीं । इसलिये आधुनिक युग के अनुसार एक सामयिक भाषा टीका का
होना अत्यन्त ही आवश्यक समझा जाता था, जिसकी पूर्ति के लिये यह भगीरथ-
प्रयास किया गया है ।
इस ग्रंथ के रचयिता महामहोपाध्याय लौगाक्षिवंशोद्भव प्रसिद्ध नामधेय
महर्षि भास्कर हैं । आपने न्यायशास्त्र में भी प्रवेश कराने के लिये छात्रोपकारार्थ
'तर्ककौमुदी' नामक ग्रंथ रचा है । इससे स्थालीपुलाकन्यायेन आपका दर्शनशास्त्र-
विषयक प्रगाढ पाण्डित्य सूचित होता है ।
प्रस्तुत संस्करण के हिन्दी टीकाकार त्यागमूर्ति स्वामी श्री टाटाम्बरी जी
महाराज रामानन्द सम्प्रदाय के परम नैष्ठिक वैष्णव संन्यासी हैं । आपका
सारा जीवन परोपकार में ही हमेशा लगा रहता है । आपने दर्शनशास्त्र का
विशेष परिशीलन कर मीमांसा शास्त्र में अनुपम वैदुष्य प्राप्त किया है । अत्यन्त
प्राचीन होते हुए भी आपने छात्रों को अत्यन्त सुगमता से समझाने के लिये इस
टीका में अत्यन्त सुन्दर एवं सरल पथ प्रदर्शित किया है । टीका में यत्र-तत्र
आपने ग्रंथ के आशय को हृदय खोलकर रख दिया है—यह आपकी एक बड़ी
विशेषता है। मुझे पूर्ण आशा है कि इस टीका से विद्यार्थियों को पूर्ण सहयोग मिलेगा ।
स्वामी टाटाम्बरी जी महाराज की इस स्तुत्य कीर्ति को निज अर्थव्यय से
प्रकाशित करने वाले गोलोकवासी स्वनामधन्य श्रेष्ठिवर श्री हरिदास जी गुप्त के
आत्मज चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालयाध्यक्ष बाबू श्री जयकृष्ण दास जी गुप्त
महोदय भी विशेष धन्यवाद के योग्य हैं । आपने अपने ६२ वर्ष के वयोवृद्ध
विश्वविख्यात चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय द्वारा जो अनवरत संस्कृत की सेवा
की है, उसके लिये संस्कृत समाज ही नहीं प्रत्युत आज का स्वतन्त्र भारत भी
आपका कृतज्ञ है ।
विनीत—
वसन्त पंचमी | ताराकान्त झा शास्त्री
वि० सं० २००९ | प्रधानाध्यापक श्री रघुवीर विद्यालय,
शींगडा, काठियावाड़
अर्थसंग्रहविषयानुक्रमणिका ।
| विषयः | पृष्ठम् | विषयः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| मङ्गलाचरणम् | १ | द्वितीयारूपाया विनियोक्त्र्या उदाहरणं | २० |
| तन्त्रारम्भकसूत्रावतरणम् | २ | द्वितीयाविनियोक्त्र्या उदाहरणम् | २१ |
| धर्मविचारशास्त्रस्यावश्यकता | ,, | सप्तमीविभक्तिविनियोक्त्र्या उदाहरणम् | ,, |
| धर्मलक्षणप्रश्नः | ३ | अमूर्ताया अपि भावनाङ्गत्वम् | ,, |
| वेदस्य धर्मप्रतिपादकत्वम् | ४ | भावनाया आख्यातवाच्यत्वम् | २२ |
| भावनाविचारः | ५ | लिङ्गनिर्वचनम् | २६ |
| शाब्दीभावना | ,, | वाक्यनिर्वचनम् | २८ |
| शाब्द्या लौकिकवैदिकभेदौ | ६ | प्रकृतिविकृतिलक्षणम् | २९ |
| आर्थीभावनालक्षणम् | ८ | प्रकरणनिरूपणम् | ३१ |
| आर्थीभावनाया अंशत्रयम् | ,, | प्रकरणद्वैविध्यम् | ,, |
| वेदलक्षणविचारः | १० | महाप्रकरणम् | ,, |
| विधिमीमांसा | ,, | अवान्तरप्रकरणम् | ३२ |
| वाक्यभेददोषपरिहारः | ११ | संदंशलक्षणम् | ,, |
| गुणविध्यादिभेदाः | १२ | स्थाननिरूपणम् | ३५ |
| उभयविधित्वम् | १३ | पाठसादेश्येन विनियोगः | ,, |
| विधिश्चतुर्विधः | १४ | अनुष्ठानसादेश्येन विनियोगः | ३६ |
| उत्पत्तिविधिः | ,, | समाख्यानिरूपणम् | ३७ |
| यागस्य रूपद्वयम् | १५ | विनियोगविधिबोधिताङ्गानि | ३८ |
| विनियोगविधिः | १६ | संनिपत्योपकारकाणि | ,, |
| विधेः श्रुत्यादिषट्प्रमाणानि | १९ | आरादुपकारकाणि | ३९ |
| श्रुतिनिर्वचनम् | ,, | प्रयोगविधिः | ,, |
| विनियोक्त्री श्रुतिस्त्रिधा | ,, | क्रमस्वरूपम् | ४० |
| तृतीयाविभक्तिरूपाया उदाहरणम् | २० | श्रुत्यादिषट्प्रमाणानि | ४१ |
२ विषयानुक्रमणिका ।
विषयः पृष्ठम् | विषयः पृष्ठम्
श्रुतिलक्षणम् ४१ | देवतारूपेणाग्निप्रापकशास्त्रप्रश्नः ६०
अर्थक्रमलक्षणम् ४२ | तद्व्यपदेशेन कर्मनामधेयत्वम् ६२
पाठक्रमलक्षणम् ४३ | कर्मनामधेयत्वे उत्पत्तिशिष्टगुण-
स्थानलक्षणम् ४४ | बलीयस्त्वम् ६३
मुख्यक्रमलक्षणम् ४७ | निषेधमीमांसा ६४
प्रवृत्तिक्रमलक्षणम् ४८ | लिङर्थशब्दभावनाया नञर्थेनान्वयः ६५
अधिकारविधिलक्षणम् ५० | नञ्स्वभावकथनम् ६६
मन्त्रमीमांसा ५४ | बाधकं द्विविधम् ,,
नियमविधिः ,, | पर्युदासपक्षे नेक्षेतेत्यस्य वाक्यार्थः ६८
परिसंख्याविधिः ५५ | विकल्पप्रसक्तौ पर्युदासाश्रयणम् ,,
परिसंख्यायाः श्रौतीत्वलाक्षणि- | बाधाद्योगोपसंहारः ६९
कत्वभेदौ ५६ | पर्युदासोपसंहारयोर्भेदवर्णनम् ७१
परिसंख्याया दोषत्रयम् ,, | विकल्पे प्रतिविध्यमानस्थानर्थ-
नामधेयमीमांसा ५७ | हेतुत्वाभाववर्णनम् ७२
नामधेयत्वे निमित्तचतुष्टयम् ५८ | अर्थवादमीमांसा ७३
नामधेयत्वस्य वाक्यभेदप्रसङ्गरूप- | अर्थवादविभागः ७४
द्वितीयनिमित्तोदाहरणम् ५९ | अर्थवादस्य भेदत्रयम् ७५
तत्प्रख्यशास्त्रात्नामधेयत्वम् ६० | ग्रन्थोपसंहारः ,,
इत्यर्थसंग्रहस्थविषयानुक्रमणिका ।
॥ श्रीः ॥
अर्थसंग्रहः
'दीपिका' टीकया विभूषितः ।
। मङ्गलाचरणम् ।
वासुदेवं रमाकान्तं नत्वा लौगाक्षिभास्करः ।
कुरुते जैमिनिनये प्रवेशायार्थसंग्रहम् ॥ १ ॥
श्रीरामं जगदीश्वरं प्रभुवरं ध्येयं सदायोगिभि-
र्भक्तानन्दकरं प्रणम्य परमानन्दस्वरूपं विभुम् ।
वैदेहीसहितं हृदा गुरुगिरं ध्यात्वा परां सर्वदा
श्रीटाटाम्बरिणा हि कौतुकधिया भाषा शुभा तन्यते ॥
बालानां सुखबोधाय मीमांसापरिशीलने ।
विदुषां प्रीतये सेयमर्थसंग्रहदीपिका ॥
लौगाक्षिभास्करजी लक्ष्मीरमणरूपी वासुदेवको प्रणामकर वेद-वेदांगको
पढ़कर धर्ममें जिज्ञासा करनेवालोंको मीमांसा शास्त्रमें प्रवेशके लिये अर्थसंग्रह
नामके ग्रन्थकी रचना करते हैं । मीमांसक लोग ईश्वरको न मानते हुए भी
द्रव्यत्यागोद्देश्य विष्णुजीको देवता मानते हैं इसलिये उनका अत्यन्त क्लिष्ट ग्रन्थ
रचनाके प्रारम्भमें सकलविघ्ननिवारणार्थ और शिष्यशिक्षार्थ स्मरणादिरूप
मंगल करना अनुपयुक्त नहीं है । परमकारुणिक भगवान् जैमिनिने द्वादश अध्या-
यमें मीमांसा शास्त्र बनाया है उसीका संक्षेपसे इस ग्रन्थमें प्रतिपादन है इसलिये
इस ग्रन्थका अर्थसंग्रह नाम सार्थक है ।
अनुबन्धचतुष्टयविचार—"सम्बन्धश्चाधिकारी च विषयश्च प्रयोजनम् । विनाऽ-
नुबन्धं ग्रन्थादौ मंगलं नैव शस्यते ॥” इत्यादि अभियुक्त वचनोंसे ग्रन्थके आरम्भमें
अनुबन्धचतुष्टय अवश्य रहता है इसलिये इस ग्रन्थमें भी अनुबन्धचतुष्टय
२ अर्थसंग्रहः—
बतलाते हैं। यथा—प्रतिपाद्य-प्रतिपादक भाव सम्बन्ध है। वेद-वेदांग पढ़कर धर्म
जिज्ञासु अधिकारी है। धर्म विषय है। यद्यपि अधर्मका भी विचार है तथापि
निराकरण करने के लिये ही उसका प्रतिपादन किया गया है। विचारित धर्मानुष्ठानसे
होने वाला स्वर्गादि प्रयोजन है।
तन्त्रारम्भकसूत्रावतरणम्।
अथ परमकारुणिको भगवान्जैमिनिर्धर्मविवेकाय द्वादशलक्षणीं प्रणि-
नीय तत्रादौ धर्मजिज्ञासां सूत्रयामास-‘अथातो धर्मजिज्ञासे'ति। अत्रा-
थशब्दो वेदाध्ययनानन्तर्यवचनः। अतःशब्दो हि वेदाध्ययनस्य दृष्टार्थ-
त्वं ब्रूते।
धर्मविचारशास्त्रस्यावश्यकता।
'स्वाध्यायोऽध्येतव्य' इत्यध्ययनविधौ तदध्ययनस्यार्थज्ञानरूपदृष्टार्थ-
कत्वेन व्यवस्थापनात्। तथा च वेदाध्ययनानन्तरं यतोऽर्थज्ञानरूपदृष्टा-
र्थकं तदध्ययनमतो हेतोर्धर्मस्य वेदार्थस्य जिज्ञासा कर्त्तव्येति शेषः।
जिज्ञासापदस्य विचारे लक्षणा। अतो धर्मविचारशास्त्रमिदमारम्भणीय-
मिति शास्त्रारम्भसूत्रार्थः।
परमकारुणिक भगवान् जैमिनि ने वेदाध्ययनके बाद धर्मविचारके लिये
द्वादशाध्याय-लक्षणात्मक मीमांसा शास्त्रको हृदयमें रखकर निर्माणार्थ सर्वप्रथम
धर्मजिज्ञासा-सूत्र बनाया। इस सूत्रमें भी अथ शब्द वेदाध्ययनानन्तर्यका ही वाचक
है। यद्यपि अथ शब्दका कोशादिसे आनन्तर्यमात्र अर्थ प्रतीत होता है तथापि
किसके अनन्तर यह आकांक्षा होनेपर वेदाध्ययनका लाभ होता है। "स्वाध्यायोऽ-
ध्येतव्यः” इस अध्ययन विधिके विचारात्मक प्रथमाधिकरणमें वेदाध्ययनका वेदा-
र्थज्ञानरूप दृष्ट प्रयोजन बतलाया है इसलिये इस सूत्रमें भी अतः शब्दसे वेदाध्ययनके
दृष्टार्थत्व (दृष्टप्रयोजन) को, सूचित करते हैं। यहां पर 'कर्त्तव्या' इस पदका
अध्याहारकर जिस हेतुसे वेदाध्ययनका अर्थज्ञानरूप दृष्ट प्रयोजन है इसलिये वेदा-
ध्ययनके बाद वेदार्थधर्मकी जिज्ञासा करनी चाहिये। यहां पर जिज्ञासा शब्दका 'ज्ञान-
विषयक इच्छा' अर्थ है और कृधातुका बनाना अर्थ है अतः इच्छा बनायी नहीं जा
सकती क्योंकि जैसे घट, कुम्भकारके व्यापारका विषय होनेसे ही किया जाता है वैसे
इच्छा किसीके व्यापारका विषय नहीं है और इच्छामात्रसे अनुष्ठानोपयोगी धर्म ज्ञान
नहीं हो सकता। इसलिये ज्ञानार्थक ज्ञाधातुका अजहल्लक्षणासे अनुष्ठानोपयोगि ज्ञान
दीपिकाटीकासहितः । ३
अर्थ समझना चाहिये और इच्छाार्थक सन्प्रत्ययका जहल्लक्षणासे विचार अर्थ
समझना चाहिये । इसलिये “इस धर्मविचारशास्त्रका आरम्भ करना चाहिये” यहाँ
शास्त्रारम्भ ( अथातो धर्मजिज्ञासा ) सूत्रका अर्थ हुआ ।
यहाँपर यह शङ्का उठती है कि यागादि ही धर्म है अथवा चैत्य ( जिन )
वन्दनादि भी धर्म है और धर्मका लक्षण क्या है ? क्योंकि लक्षण और प्रमाणके
विना वस्तु की सिद्धि नहीं होती । कहा भी है ( मानाधीना ) प्रमाणके अधीन
(मेयसिद्धिः ) वस्तु की सिद्धि होती है और ( मानसिद्धिश्च ) प्रमाण की सिद्धि
(लक्षणात् ) लक्षणसे होती है । सजातीय विजातीय वस्त्वन्तरसे अपने लक्ष्यको
विभिन्न बतलाने वालेको ही लक्षण कहते हैं । जैसे गन्धवत्त्वसे पृथिवीमें सजातीय
( जलादिद्रव्य ) विजातीय ( गुणादि ) से भेद सिद्ध होता है इसलिये गन्धवत्त्व
पृथिवीका लक्षण है । इसलिये निम्न लक्षण प्रश्न आवश्यक है ।
धर्मलक्षणप्रश्नः ।
अथ को धर्मः, किं तस्य लक्षणमिति चेत् । उच्यते—यागादिरेव
धर्मः । तल्लक्षणं वेदप्रतिपाद्यः प्रयोजनवदर्थो धर्म इति । प्रयोजनेऽतिव्याप्ति-
वारणाय प्रयोजनवदिति । भोजनादावतिव्याप्तिवारणाय वेदप्रतिपाद्य इति ।
अनर्थकउक्तत्वादनर्थभूते श्येनादावतिव्याप्तिवारणायार्थ इति ।
यागादि ही धर्म है यहां एव शब्दसे चैत्यवन्दन धर्म नहीं है यह सूचित
होता है । आदि पदसे मंगलाचरण और दध्यादिरूप गुण प्रभृतिका संग्रह करना
चाहिए । जो वेदसे ( प्रतिपाद्य ) कहा गया हो, प्रयोजनवाला हो और अर्थ हो,
उसीको धर्म कहते हैं । इस लक्षणमें प्रयोजनवत् पद नहीं देनेसे स्वर्गादि-
रूप ( प्रयोजन ) अर्थमें अतिव्याप्ति होगी क्योंकि स्वर्ग वेदप्रतिपाद्य
और ( अर्थ ) प्रयोजन है । प्रयोजनवत् पद देनेपर स्वर्गादि सुखादिरूप है
इसलिये इसका प्रयोजनान्तर नहीं है । अतः अतिव्याप्ति नहीं हुई ।
वेदप्रतिपाद्य पद नहीं देनेपर भोजनादिमें अतिव्याप्ति होगी क्योंकि भोजन
तृप्त्यादिरूप प्रयोजनवाला और अर्थ भी है । वेदप्रतिपाद्यपद देनेसे भोजन राग
प्राप्त है इसलिये अतिव्याप्ति नहीं होती । यद्यपि 'अष्टौ ग्रासा मुनेर्भक्ष्याः षोडशा-
रण्यवासिनाम् । द्वात्रिंशत्तु गृहस्थस्य यथेष्टं ब्रह्मचारिणाम् ॥' इत्यादि विधिबोधित भी
भोजन है तथापि इस वचनको ग्रासनियमपरक मानते हैं । इसलिये वेदप्रतिपाद्य
४ अर्थसंग्रहः—
पदसे उसका भी वारण हो सकता है । अर्थपद नहीं देनेसे अनर्थभूत श्येनादिमें अति-
व्याप्ति होगी क्योंकि वह 'श्येनेनाभिचरन् यजेत' इत्यादि वेदप्रतिपाद्य और शत्रुवधरूप
प्रयोजनवान् भी है। यद्यपि नरकजनक ही अनर्थ होता है श्येनकर्म नरकजनक
नहीं है इसलिये अनर्थ भी नहीं है अत एव चतुर्थाध्याय में श्री जैमिनिजीने भी इष्ट-
साधनत्वेन वेदबोधित श्येनकर्मको भी धर्म कहा है, इसलिये अर्थ पदका व्यावत्र्य-
श्येन नहीं हो सकता तथापि शत्रुवध नरकजनक है अतः अनर्थफलकत्वात्
शत्रुवध द्वारा नरकजनक श्येनकर्म भी अनर्थ है । चतुर्थाध्यायमें साक्षादिष्टसाधन-
त्वेन वेदबोधित वधमात्र के अभिप्रायसे ही श्येनकर्मको धर्म कहा है पर वस्तुतः
परंपरया वह अनिष्ट (नरक) जनक है इसलिये चतुर्थोध्यायसे विरोध नही होता है ।
अत एव “चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः” इस सूत्रमें अर्थ पद सार्थक होता है । जैसे
परामर्शसे व्यवहित व्याप्तिज्ञानमें अनुमितिजनकत्व माना गया है इसी तरह शत्रु-
वधव्यवहित श्येनकर्ममें भी नरकजनकत्व माननेमें कोई अनुपपत्ति नहीं है ।
वेदस्य धर्मप्रतिपादकत्वम् ।
न च 'चोदनालक्षणोऽर्थो धर्म' इति सौत्रलक्षणविरोधः चोदनापद-
स्य विधिरूपवेदैकदेशपरत्वादिति वाच्यम् । तत्रापि चोदनाशब्दस्य वेद-
मात्रपरत्वात् । वेदस्य सर्वस्य धर्मतात्पर्यवत्त्वेन धर्मप्रतिपादकत्वात् ।
वेदप्रतिपाद्य घटित धर्मके लक्षणमें सूत्रकारोंने जो 'चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः'
यह धर्म का लक्षण बनाया इससे विरोध लगता है क्योंकि यहांपर चोदनापदका
अर्थ, विधिरूप वेदैकदेश है और उसके मतसे विधिरूप वेदैकदेश
प्रतिपादित जो अर्थ वही धर्म है और आपके मतसे वेदप्रतिपादित जो अर्थ
वह धर्म है अतः विरोध स्पष्ट है । यह शंका नहीं कर सकते हो क्योंकि सूत्र-
कारीय धर्मलक्षणमें चोदनापदका चोदना (विधि) प्रकरणपठित समस्त वेद अर्थ
है अतः सूत्रकारके मतसे भी वेदप्रतिपाद्यघटित ही धर्म का लक्षण है इसलिये
विरोध नहीं होगा। यहां पर “सोऽरोदीद् यदरोदीत्तद्रुद्रस्य रुद्रत्वम् । स प्रजापतिरा-
त्मनो वपामुदखिदत्” इत्यादि चोदनाशेष वाक्योंसे धर्मप्रतिपादित नहीं है अतः
तत्प्रतिपाद्य अर्थमें अतिव्याप्ति होगी यह नहीं कह सकते हैं क्योंकि यह वाक्य भी
स्तुत्यादि प्रतिपादन द्वारा धर्मप्रतिपादक है इसलिये चोदना प्रकरण पठित
समस्त वेदोंके धर्ममें तात्पर्य होने से समस्त वेद धर्मप्रतिपादक ही है ॥