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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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साहिब बन्दगी

अब निरंजन अपनी जगह आया। उसने कहा, मैं भी तुम्हारा नाम लेकर पंथ चलाऊँगा और जीवों को उलझा दूँगा। किसी को पता नहीं चलेगा कि सच क्या है और झूठ क्या है। यानी उसने कहा कि मैं नाम अपने वाला दूँगा और उस पर मोहर तुम्हारी होगी। इसलिए आज दुनिया में जीव उलझन में हैं, पता नहीं चल पाता है कि इतने नामों में से कौन-सा नाम सच्चा है और वो किसके पास है।

साहिब ने कहा

कहे ज्ञानी सुन काल विचारा। हंस हमार नहीं न्यारा ॥
निसवासर रहै लौ लीना। शब्द विचार होय नहीं भीना ॥
हंस हमारा शब्द अधिकारा। पुरुष परताप को करे सम्हारा ॥
नाम जपै अरु सुरत लगाई। मिले कर्म लागे नहीं काई ॥
शब्द मानि होय शब्द सरूपा। निश्चय हंस होय अनूपा ॥
साहिब ने कहा-हे निरंजन! जिसे सच्चा नाम मिल जाएगा, वो निर्मल हो जाएगा, फिर वो तुम्हारी तरफ जाएगा ही नहीं।

निरंजन ने कहा

ज्ञानी मोर अपर बल ज्ञाना। वेद किताब भरम हम माना ॥
इनको माने सब संसारा। कलि में गंगा मुक्ति द्वारा ॥
देही दान से उतरे पारा। ऐसे सुमृत कहें विचारा ॥
यह विधि जग जीव भुलाहीं। जरा मरन सब बंध बंधाहीं ॥
सूतक पातक वेद विचारा। पूछ वेद से करहि सँहारा ॥
एकादशी मुक्ति को भाई। योग जग्य करवे अधिकाई ॥

निरंजन ने कहा कि मैंने सूतक, पातक, कर्मकाण्ड आदि अनेक वहमों में जीवों को उलझाया हुआ है, सब इन्हीं को मानते हैं, तुम्हारी बात कोई मानेगा ही नहीं, इसलिए मत जाओ दुनिया में।