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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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अनुरागसागर वाणी

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लोभ जन्म सूकर अवतारा । कैसे पावै मोक्ष को द्वारा ॥
विषई विषै सब विष की खानी । ऐ सब कहिये जम सहिदानी ॥

निरंजन ने कहा कि मैंने काम, क्रोध आदि में जीव को फँसाया हुआ है। ऐसे में तो कोई भी जीव परम पुरुष के लोक में नहीं पहुँच सकता। इस पर भी यम के 14 दूत मैंने हरेक में फिट किये हुए हैं, तुम उन्हें कैसे निकालोगे उन्हें ! प्रत्येक आदमी के भीतर यम के 14 दूत बैठे हुए हैं। एक का काम हैं-नींद लाना, एक का काम है- विषयों को दिल में उत्पन्न करना, एक का काम है-मौज करना। जिससे जीव मौज करता है। एक का काम है-चित्त भंग कर देना। इसका नाम है-चित्तभंगा, आदि ये यम के 14 दूत हैं, जो जीव को भ्रमित कर रहे हैं। इनके साथ काम, क्रोध आदि भी जीव पर छाए हुए हैं। विषयों में जीव को उलझा दिया है। जीव बड़ा गंदा हो गया है, तुम्हारे शब्द को कोई नहीं मानेगा।

साहिब ने कहा

ज्ञानी कहै करहु वरियारा । हमतो कीन्ह सकल निरबारा ॥
जोई ज्ञानी होय हमारा । काम क्रोध ते होय नियारा ॥
तूस्ना लोभहि देई बहाई । विषै जन्म सब दूर पराई ॥
उनको ध्यान शब्द अधिकारी । काम क्रोध सब होय नियारी ॥
नाम ध्यान हंस घर जाई । क्या रे काल तुम करो बड़ाई ॥
उनमें यम का परै न छाहीं । ताते हंस लोकहि जाई ॥

साहिब ने कहा कि जिस शरीर में यह नाम दे दूँगा, तेरा जोर उसमें नहीं चलेगा। वहाँ काम, क्रोध निकट नहीं आयेंगे और वो जीव निर्मल हो जायेगा, तुम उस जीव को छू भी नहीं पाओगे और वो जीव हंस रूप होकर अपने देश में चला जायेगा।

निरंजन ने कहा

कहे निरंजन सुन हो ज्ञानी । कथि हा जान तुम्हारी बानी ॥
युगत महात्म सबै बताऊँ । तुम्हारा नाम ले पंथ चलाऊँ ॥