अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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साहिब ने कहा
सुनहु काल ज्ञान की संधी । छोरो जीव सकल की फंदी ॥
जब निज बीरा हंस पावै । जोग बरत तप सबै नसावै ॥
वेद किताब की छोड़े आसा । हंस करे शब्द विस्वासा ॥
ताके निकट काल नहीं आवे । निज बीरा जो सुरत लगावे ॥
जोग बरत पतहू है छारा । अद्भुत नाम सदा रखवारा ॥
साहिब ने कहा कि जिसे सच्चा नाम मिल जाएगा, उसका सारा वहम अन्दर से धुल जाएगा, काल भी उसके निकट नहीं आ पाएगा। नाम सदा उसकी रक्षा करेगा।
निरंजन ने कहा
अब तुम ज्ञानी भली सुनाई । मेरो उरझो सुरझो नहीं जाई ॥
पावै शब्द होय अभिमानी । कैसै लोक जाहिं प्रानी ॥
सब्द पाय कर चले न राहा । ज्ञानी कहाँ मुक्ति की थाहा ॥
निरंजन ने कहा कि मैंने जो उलझने डाली हुई हैं वे सुलझेंगी ही नहीं, जीव नहीं समझेगा, यदि तुमने अपना शब्द दे भी दिया, तो भी जीव अहंकार में रहेगा, तुम्हारे नियमों पर नहीं चलने पायेगा, फिर मुक्ति कैसे मिलेगी !
साहिब ने कहा
तब ज्ञानी बोले मुख बानी । सुनियो काल निरंजन आनी ॥
हंस भक्ति जो करे हमारी । राखो सदा सब्द निज धारी ॥
काम क्रोध अहंकार बिकारा । इनको तजिहैं हंस हमारा ॥
पहुँचे हंस पुरुष दरबारा । अरे काल तोको तज डारा ॥
साहिब ने कहा कि जो नाम पाकर मेरी भक्ति करेंगे, वे काम, क्रोध आदि छोड़ देंगे और तुम्हारी दुनिया को त्याग परम पुरुष के दरबार में पहुँच जायेंगे।