अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
Page 92 of 144
Read in context92
साहिब बन्दगी
भी है—जो रक्षक तहँ चीहनत नाहिँ, जो भक्षक तहँ ध्यान लगाहीं। निरंजन ने कहा कि इस पर भी मैंने पाप पुण्य में जीव को बाँधा हुआ है, आम आदमी की बात ही क्या है, सुर, नर, मुनि सारे संसार को बाँधा हुआ हूँ। एक भी जीव को जाने नहीं दूँगा। निरंजन ने साहिब से यह कहा। अब साहिब कह रहे हैं।
साहिब कहते हैं
ज्ञानी कहँ काल अन्यायी। शब्द बिना तू खाय चबाई॥
अब तुम कस खैहो बटसारा। पुरुष भाषों विश्वासा॥
सुभ अरू असुभ का करे निबेरा। मेटो काल सकल उरझेरा॥
साहिब ने कहा—हे निरंजन! इसलिए तो मैं आया हूँ, तुमने एक भी जीव को सतलोक नहीं आने दिया। तब इनके पास में सच्चा नाम नहीं था, ये अपने जोर से पार होना चाहते थे..... तुमने खा लिया। पर अब मैं परम पुरुष का बड़ा जबरदस्त नाम दूँगा, और तुम्हारा बस अब जीव पर नहीं चलने दूँगा, अन्दर से विश्वास भी नाम उन्हें देता जायेगा। शुभ और अशुभ का ज्ञान भी अन्दर से होता जायेगा, नाम जीव को पूरी सुरक्षा देता चलेगा और तुम्हारे सब बंधनों से छुड़ाकर अमर लोक ले जायेगा। साहिब ने एक अन्य स्थान पर भी कहा है—सुमिरन पाय सत्य जो वीरा, संग रहूँ मैं दास कबीरा।
निरंजन ने कहा
निरगुन काल तब बोले बानी। उरझे जीव सकल जम खानी॥
कैसे के तुम शब्द पसारो। कौने विधि तुम जीव उबारौ॥
ऐसे जीव सकल हैं करनी। कैसे पहुँचै पुरुष की सरनी॥
जग में जीव क्रोध विकरारा। कैसे पहुँचै पुरुष के द्वारा॥
क्रोधी जीव प्रेत अभिमानी। धरिहँ जन्म नरक की खानी॥
लोभ होय सरप विकरारा। माटी भखे जीव अधिकारा॥