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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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अनुरागसागर वाणी

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जहाँ तहाँ जग भरमावै । ज्ञान संधि कछु रहन न पावै ॥

एक शब्द की कैतक आशा । मेरे हैं चौरासी फाँसा ॥

निरंजन ने साहिब से कहा कि तुम जीवों को मुझसे छुड़ाकर ले ही नहीं जा सकते, मैंने पाँच तत्वों से शरीर की रचना की है। उस पर फिर पाप-पुण्य में जीवों को बाँधा हुआ है। मन रूप में मैं सबके अन्दर समाया हुआ हूँ, किसी को सोचने भी नहीं देता हूँ कि क्या माज़रा है, तुम्हारा एक शब्द क्या कर लेगा, मैंने चौरासी लाख योनियों में जीव को उलझाया हुआ है।

साहिब कहते हैं

बोले ज्ञानी शब्द बिचारी । छूटे चौरासी की धारी ॥

छूटे पाँच पचीस गुण तीनों । ऐसा शब्द पुरुष मैं दीन्हों ॥

साहिब ने कहा कि मेरे पास बड़ा ज़बरदस्त नाम है, जिन्हें परम पुरुष का नाम(शब्द) दे दूँगा, उनका तुम कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे। वो जीव तुम्हारे फंदे से आजाद हो जायेगा।

निरंजन ने कहा

हे ज्ञानी का करो बड़ाई । हमते नाहिं छूट जिव जाई ॥

इसने युग भये का तुम देखा । ज्ञानी हँस न ऐको पेखा ॥

का तुम करो का शब्द तुम्हारा । तीन लोक परलय कर डारा ॥

साधु संत हम देखी रीती । परलय परे सकल जग जीती ॥

करम रेख बाँधै सब साधा । सुर नर मुनि सकलो जग बाँधा ॥

निरंजन ने कहा कि इतने युग हो गये, क्या एक भी जीव को सतलोक आते देखा। बड़ी ताकत से मैंने जीव को बाँधा हुआ है, छूटने नहीं दूँगा, तुम और तुम्हारा शब्द क्या कर लेगा, मैं तीन लोक का नाश कर देता हूँ। निरंजन ने कई बार स्मृष्टि का प्रलय भी किया है। यह सब काम साहिब के नहीं हैं, परम पुरुष के नहीं हैं। इस पर साहिब ने कहा