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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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रक्षक की कला दिखा अंत में जीवों को

खा जाता हैं निरंजन

धर्मदास ने पूछा

धर्मदास कहे शुभ दिन मोरा । हे प्रभु दर्शन पायउ तोरा ॥
हे साहिब मैं तुम बलिहारी । आगल कथा कहो निरवारी ॥
चार खानि रचि पुनि कस कीन्हा । सो सब मोहि बतावो चीन्हा ॥

धर्मदास जी ने कहा—हे साहिब । आज बहुत ही शुभ दिन है जो आपका दर्शन हुआ, कृपा करके अब मुझे आगे की कथा कहो, मुझे बताओ कि चार खानि की रचना के बाद क्या किया गया !

साहिब ने कहा

सुन धर्मन यह है यमबाजी । जेहि न चीन्हे पंडित काजी ॥
चारहु मिलि यह रचना कीन्हा । कच्चा रंग सु जीवहि दीन्हा ॥
पाँच तत्व तीनों गुण जानो । चौदह यम ता संग पिछानो ॥
यहि विधि कीन्हीं नर की काया । मारे खाय बहुरि उपजाया ॥
ओंकार है वेद को मूला । ओंकार में सब जग भूला ॥
है ओंकार निरंजन जानो । पुरुष नाम सो गुप्त अमानो ॥
सहस अठासी ब्रह्मा जाया । भा विस्तार काल की छाया ॥
ब्रह्मा ते जिव उपजे बारा । तिन पुनि कथे बहुत विस्तारा ॥
स्मृति शास्त्र पुराण भटकावा । अलख निरंजन ध्यान दृढ़ावा ॥
वेद मते सब जिव भरमाने । सत्य पुरुष को मर्म न जाने ॥
निरंकार कस कीन्ह तमासा । सो चरित्र बूझो धर्मदासा ॥

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