अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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साहिब कह रहे हैं—हे धर्मदास! यह काल का खेल पंडित-काजी आदि नहीं समझ पाए। अद्वा और त्रिदेव ने मिल जगत की रचना की और जीव को कच्छा रंग दिया यानी नश्वर शरीर में डाला। पाँच तत्व, तीन गुण और 14 यम एक जीव के साथ कर दिये। यानी 14 यम इस काया में जीव को भटकाने के लिए रखे। इस तरह मनुष्य की देही का निर्माण किया और बार-2 मार-खाकर बार-2 उत्पन्न किया। वेद में भी ओंकार की बात की गयी और इसी ओंकार में सारा जगत भटक गया। यही ओंकार निरंजन अथवा निरंकार है। परम पुरुष का भेद गुप्त रखा गया। काल ने अपना इतना विस्तार किया कि 88 हजार ब्रह्मा उत्पन्न किये, फिर ब्रह्मा ने आगे जीवों की सृष्टि की और वेद, शास्त्र आदि में सबको उलझा दिया, निरंजन का ध्यान करने को कहा। वेद-मत के अनुसार सभी जीव भ्रमित हुए, परम पुरुष का भेद नहीं मिला। साहिब कह रहे हैं— हे धर्मदास! यह सब निरंजन ने ही किया।
असुर है जीव सतावै, देव ऋषि मुनि कारकं ।
पुनि धरि अवतार रक्षक, असुर करत संहारकं ॥
जीव को दिखलाय लीला, आपनी महिमा घनी ।
यहि जान जीव बाँध आसा, यही है रक्षक धनी ॥
रक्षक कला दिखलाय कर, अंत काल भक्षण करै ।
पीछे जीव पछिताय बहुत, जब काल के मुख में परै ॥
यही निरंजन असुर रूप में आकर जीवों को सताता है, ऋषि-मुनियों को तंग करता है और फिर यही अवतार धारण कर रखवाला बनने की कला दिखाते हुए असुरों का संहार करता है। यह जीवों को अपनी लीला दिखाकर अपनी महिमा बताता है और जीव सोचते हैं कि शायद यही रक्षक है, पर वो रक्षक की कला दिखाकर अंतकाल में जीवों को खा जाता है। और फिर जीव जब काल के मुख में जाते हैं तो पछताते हैं।