अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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झूठे वचन सभा में कहई। टेढ़ी पाग छोर उरमई ॥
दया धरम मनहीं नहिं आवे। करें पुण्य तेहि हाँसी लावे ॥
भाला तिलक अरु चंदन करई। हाट बजार चिकन पट फिरई ॥
अन्तर पापी ऊपर दया। सो जिव यम के हाथ बिकाया ॥
लंब दाँत अरु वदन भयावन। पीरे नेत्र ऊँच अति पावन ॥
उकमज खानि से मानव तन में जो आए होते हैं, उन्हें शिकार खेलने में बड़ा आनन्द आता है। शिकार मारकर लाते हैं, और बड़े यत्न से पकाकर खाते हैं। गुरु और उनके नाम की निंदा करते हैं, झूठ बोलते हैं, टेढ़ी पगड़ी पहनते हैं, जिसका छोर लम्बा लटकता रहता है, उनके हृदय में दया-धर्म कुछ भी नहीं होता और दूसरों को पुण्य कर्म करते देख उनकी हँसी उड़ाते हैं। खुद माथे पर तिलक और चन्दन लगाकर बाजार में मटक-2 कर चलते हैं, उनके हृदय में कपट होता है, हृदय उनका कठोर होता है और ऊपर से कोमल बनते हैं, उनके दाँत लम्बे और शरीर डरावना होता है, उनकी आँखें आगे को उभरी होती हैं।
अचल खानि को कहौँ सँदेसा। देह धरे जस होवें भेसा ॥
छनिक बुद्धि होवे जिव कैरी। पलटत बुद्धि न लागे बेरी ॥
झंगा फेटा सिर पर पागी। राज द्वार सेवा भल लागी ॥
इत उत चितवत सैन जुमारहि। पर नारी कहँ सैन बुलावहि ॥
रस सों बात कहें मुख जानी। काम बान लागे उर आनी ॥
पर घर ताकहिं चोरों जायी। लाज सर्म उपजे नहिं भाई ॥
छन इक मन महँ बिसरे देवा। छन इक मन महँ कीजे सेवा ॥
छन इक ज्ञानी पोथी बाँचा। छन इक माहिं सबन घर नाचा ॥
छन इक मन में कीजे धर्मा। छन इक मन में करे अकर्मा ॥
भोजन करत माथ खजआई। बाँह जाँघ पुनि भींजत भाई ॥