अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextविभिन्न योनियों से मानव तन में आए
हुओं की पहचान
प्रथम अंडज की कहीं मैं बानी। एकहि एक कहो बिलछानी ॥
आलस निद्रा ता कहँ होइ। काम क्रोध दरिद्री सोइ ॥
चोरी चुगली निंदा ठाने। ज्ञान ध्यान कछु मनहिं न आनै ॥
गुरु सतगुरु चीन्हें नहिं भाई। वेद शास्त्र सब देइ उठाई ॥
आपन नीच ऊँच मन होई। हम सम दूसर और ना कोई ॥
मैंले बस्तर नहीं नहाई। आँख कीच मुख लार बहाई ॥
पाँसा जुवा चित्त मन आने। गुरु चरनन निसि नहिं जाने ॥
कुबरा मूढ़ ताहि का होई। लम्बा होय पाव पुनि सोई ॥
साहिब कह रहे हैं कि जो अंडज खानि से मानव तन में आए हैं, उनकी पहचान बताता हूँ। उनमें निद्रा होती है, काम, क्रोध, से ग्रस्त होते हैं, दरिद्री होते हैं, चोरी, चुगली, परायी निंदा आदि ही उनका काम होता है, दूसरों के घर में आग लगाते हैं। सबसे बहस करते हैं, पर कुछ भी ज्ञान, ध्यान उनमें नहीं होता। गुरु-सतगुरु की पहचान उन्हें नहीं होती, वेद-शास्त्रों का कुछ पता नहीं होता, तुच्छ होते हुए भी खुद को बड़ा समझते हैं, मैंले कपड़े पहने रखते हैं, आँखों से कीच और मुँह से लार टपकती रहती है, जुए में मस्त रहते हैं, सिर उनका कुबड़ा और पाँव लम्बे होते हैं।
कहेँ कबीर सुनो धर्मदासा। ऊष्मज भेद कहैं परकासा ॥
जाइ शिकार जीव बहु मारे। बहुत आनंद होय तिमि वारे ॥
मार जीव जब घर कहँ आयी। बहु विधि रांध ताहि कहँ खाई ॥
निंदे शब्द और गुरु देवा। निंदे चौका नरियर भेवा ॥
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