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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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साहिब बन्दगी

भोजन करत सोय पुनि जाई । जो जगाय तिहि मारन धाई ॥
आँखें लाल होहिं पुनि जाकी । कहैं लग भेद कहौं मैं ताकी ॥

अस्थावर खानि से मनुष्य योनि में आने वालों की बुद्धि स्थिर नहीं होती, उनका निर्णय बदलता रहता है, सिर पर पगड़ी बाँधे रहते हैं, सरकारी नौकरी करते हैं, दूसरे की स्त्री की तरफ नज़र रखते हैं, इशारे से बुलाते हैं, कामुक बातें करते हैं और चोरों की तरह दूसरों के घर में घुसते हैं, यदि पकड़ लिए जाते हैं तो भी कोई शर्म नहीं होती, हँसते रहते हैं, एक क्षण में तो अपने ईष्ट को भूल जाते हैं और दूसरे ही क्षण उनकी सेवा करने लग जाते हैं, एक क्षण में तो पोथियाँ पढ़ने लगते हैं और दूसरे ही क्षण सबके घर में मौका मिलने पर नाचने लग जाते हैं, एक पल में तो शूरवीर हो जाते हैं और दूसरे ही पल कायर हो जाते हैं, एक पल तो अच्छे हो कर्म करने लगते हैं और दूसरे ही पल कुकर्मों में लग जाते हैं। भोजन करते हुए अपना माथा खुजलाते हैं, बाँह और जाँघ मलते हैं, भोजन के बाद सो जाते हैं और यदि कोई जगाए तो उसे मारने दौड़ते हैं, उनकी आँखें लाल होती हैं, उनका भेद कहाँ तक कहा जाए!

पिंडज खानिक लच्छ सुनाऊँ । गुन औगुन का भेद बताऊँ ॥
बैरागी उनमुनि मति धारी । करे धर्म पुनि वेद विचारी ॥
तीरथ औ पुनि योग समाधि । गुरु के चरण चित्त भल बाँधी ॥
वेद पुराण कथे बहु ज्ञाना । सभा बैठि बातें भल ठाना ॥
राज भोग कामिनि सुख माने । मन शंका कबहुँ नहिं आने ॥
उत्तम भोजन बहुत सुहाई । लौंग सुपारी बीरा खाई ॥
चच्छु तेज जाकर पुनि जानी । पराक्रम देही बल ठानी ॥
देखो स्वर्ग सदा तेहि हाथा । देखे प्रतिमा नावे माथा ॥

पिंडज खानि से मानव तन में आने वालों में वैराग्य होता है, वे वेद के अनुसार धर्म कार्य करते हैं, तीर्थ, योग आदि करते हैं और गुरु से प्रेम