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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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ज्ञान विभिन्नता का कारण

धर्मदास पूछते हैं

कहे धर्मदास सुन बंदीछोरा । इक संशय प्रभु मेटो मोरा ॥
सब नर नारि तत्व सम आहीं । इक सम ज्ञान सबन को नाहीं ॥
दया सील संतोस छमा गुन । कोई शून्य कोई होय संपुरन ॥
कोई मनुष्य होय अपराधी । कोई सीतल कोई काल उपाधी ॥
नाना गुन किहि कारण होई । साहिब बरन सुनाओ सोई ॥

धर्मदास ने पूछा-हे साहिब! सभी नर-नारियों में भी एक समान ज्ञान क्यों नहीं है, जबकि सबमें तत्वों की समानता है। कोई पापी है तो कोई पुण्यात्मा, कोई ज्ञान शून्य है तो कोई बहुत ज्ञानवान। विभिन्न गुणों वाले नर-नारी क्यों हैं!

साहिब कहते हैं

धर्मदास परखहुँ चित्त लायी । नर नारि गुन कहुँ समझायी ॥
चारि खानि जीव भरमाया । तब ले नर की देही पाया ॥
देह धरे छोड़े जस खाना । तैसे का कहुँ ज्ञान बखाना ॥

साहिब धर्मदास से कहते हैं कि चार खानि में भरमने के बाद जीव को मनुष्य तन मिलता है और जिस खानि की देह को छोड़कर वो मानव तन में आता है, उसी के अनुसार उसमें ज्ञान और गुणों का समावेश हो जाता है।

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