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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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साहिब बन्दगी

शिवजी ने कहा-हे माता! मेरा शरीर कभी न मिटे।

कह अष्टंगी अस नहीं होई। दूसरा अमर भयो नहीं कोई॥

करहु योग तप पवन सनेहा। रहै चार युग तुम्हरी देहा॥

जौ लौं पृथ्वी अकाश सनेही। कबहुँ न विनशै तुम्हरी देही॥

आद्य शक्ति ने कहा-हे शिव! दूसरा अमर कोई नहीं हुआ, तुम पवन योग करो, जब तक पृथ्वी, आकाश, ब्रह्माण्ड रहेगा, तुम्हारा शरीर रहेगा।

ब्रह्मा मन में भयो उदासा। तब चलि गयो विष्णु के पास॥

जाय विष्णु सो विनती ठाना। तुम हो बंधु देव परधाना॥

तुम पर माता भई दयाला। शाप विवश हम भये बिहाला॥

निज करनी फल पाये हो भाई। किहि विधि दोष लगाऊँ माई॥

अब अस जतन करो हो भ्राता। चले परिवार वचन रहे माता॥

ब्रह्मा जी उदास होकर विष्णु के पास गये और विनती करते हुए कहा कि माता तुम पर दयाल हुई और शाप के कारण मेरा बुरा हाल हुआ, तुमने अपनी करनी का फल ही पाया है, इसलिए माता को भी दोष नहीं लगाया जा सकता है, पर अब कोई ऐसा यत्न करो कि माता की बात भी रह जाए और मेरा वंश भी चले।

कहे विष्णु छोड़ो मन भंगा। मैं करिहौं सेवकाई संग॥

तुम जेठे हम लहुरे भाई। चित संशय सब देहु बहाई॥

जो कोई होवे भक्त हमारा। सो सेवै तुम्हरो परिवारा॥

विष्णु ने कहा-हे ब्रह्मा! तुम बड़े भाई हो और मैं छोटा हूँ, मैं