अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextविष्णु बने ठाकुर
धर्मदास ने पूछा
हे साहब यह जान्यो भेदा। अब आगे का करहु उछेदा ॥
कहा कि अब आगे का भेद समझाकर कहें।
साहिब ने कहा
पुनि माता कहि विष्णु दुलारा। मरदयो मान जेठनिजबारा ॥
अहो बिस्नु तुम लेहु असीसा। सब देवन में तुमही ईसा ॥
प्रथम पुत्र ब्रह्मा दुरि गयऊ। अकरम झूठ ताहि प्रिय भयऊ ॥
देवन श्रेष्ठ तुमहिं कहैं मानहिं। तुम्हरी पूजा सब कोइ ठानहिं ॥
माता ने विष्णु को आशीर्वाद दिया कि तुम सब देवताओं में श्रेष्ठ होंगे, क्योंकि बड़े पुत्र ब्रह्मा ने झूठ और कुकर्म जैसे पाप किये, इसलिए अब सब तुम्हारी ही पूजा करेंगे।
रूद्र पास गयी तब माता। तुम शिव कहो हृदय की बाता ॥
माँगहु जो तुम्हरे चित भावे। सो तोहि देऊँ मात फरमावे ॥
अद्या ने फिर शिवजी से पूछा कि तुम क्या चाहते हो, माँग लो।
जोरि पानि शिव कहबे लीन्हा। देहु जननि जो आज्ञा कीन्हा ॥
कबहुँ न बिनसे मेरी देही। हे माता माँगों बर ऐही ॥
हे जननी यह कीजै दाय। कबहु न बिनसै मेरी काया ॥
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