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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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नहीं पहुँच पाये विष्णु

आज्ञा माँगि विष्णु चले बाला । पिता दरश को चले पताला ॥
इत उत चितय महे स न डोला । सेवा करत कछू नहिं बोला ॥
तेहि शिव मन अस चितं अभावा । सेवा करन जननि चित लावा ॥
यहि विधि बहुत दिवस चलि गयऊ । माता सोच पुत्र कस कियऊ ॥

विष्णु जी भी आज्ञा माँगकर पिता के दर्शन को पाताल में चले गये । पर शिवजी कहीं नहीं गये; वे माता की सेवा में लगे रहे । इस तरह बहुत दिन बीत गये, माता ने सोचा कि पुत्रों ने यह क्या किया ।

प्रथम विष्णु जननी ढिग आये । अपनी कथा कहि समुझाये ॥

सबसे पहले विष्णु लौटकर माता के पास आए और सच्ची-2 बात बता दी कि मैं पिता के चरण नहीं देख सका ।

सुनि हर्षित भइ आदि कुमारी । लीन्ह विष्णु कहँ निकट दुलारी ॥

चूमेउ बदन सीस दियो हाथा । सत्य सत्य बोलेउ सुत बाता ॥

विष्णु की बात सुन शक्ति ने उसे आशीर्वाद दिया और उसका मुख चूमा, उसे प्यार किया, कहा-तुमने सत्य बोला है ।

पुनि कह माता विष्णु दुलारा । सुनहु पुत्र इक वचन हमारा ॥

सत्य सत्य तुम कहो बुझाई । पितु पद परसन जब गै भाई ॥

प्रथम हुतो तुम गौर शरीरा । कारण कौन श्याम भए धीरा ॥

माता ने विष्णु से कहा-तुम सत्य बोलो कि तुम पिता के चरण स्पर्श नहीं कर सके, पर यह बताओ कि पहले तो तुम गौर वर्ण थे, अब श्याम वर्ण कैसे हो गये !

आज्ञा पाय हम तत्काला । पितु पद परसन चले पताला ॥

अक्षत पुहुप लीन्ह कर माहँ । चले पताल पंथ मग जाहँ ॥

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