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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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साहिब बन्दगी

पहुँचि शेषनाग पहुँ गयऊ । विष के तेज हम अलसयऊ ॥
भयो श्याम विष तेज समावा । भइ अवाज अस वचन सुनावा ॥
अहो विष्णु माता पहुँ जायी । बचन सत्य कहियो समझायी ।
सतयुग त्रेता जैहै जबही । द्वापर है चौथा पद तबही ॥
तब तुम हौहु कृष्ण अवतारा । लैहो ओयल सो कही विचारा ॥
नाथहु नाग कलिंदी जाई । अब तुम जाहु विलंब न लाई ॥
पहुँचे हम तब ही तुव पास । कीन्है उ सत्य वचन परकासा ॥
भेटे उ नाहिं माहि पद ताता । विष ज्वाला साँवले भो गाता ॥
व्याकुल भयो तबै फिरि आयो । पितु पद दर्शन मैं नहिं पायो ॥

विष्णु ने कहा कि तुम्हारी आज्ञा पाकर जब फूल लेकर मैं पाताल लोक में गया तो रास्ते में शेषनाग मिले, उनके विष के प्रभाव से मैं अचेत हो गया और मेरा वर्ण श्याम हो गया, तब शेषनाग ने कहा कि हे विष्णु! माता के पास वापिस लौट जाओ और सत्य कहना। उसने कहा कि सतयुग और त्रेता युग बीत जायेंगे तो द्वापर युग आयेगा, तब तुम्हारा कृष्णावतार होगा, मुझे नाथना, पर अब जल्दी से लौट जाओ। तब हम तुम्हारे पास आ गये और पिता के चरणों का दर्शन नहीं कर सके। (शेषनाग कालीनाग के रूप में यमुना में रहता था।)