अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextब्रह्मा गये आकाश में
जननी गुन्यो वचन चित माहीं। मोरि कही यह मानत नाहीं॥
या कहँ वेद दीन्ह उपदेसा। पै दरस तै नहिं पावे भेसा॥
कह अष्टंगी सुनो रे बारा। अलख निरं जन पिता तुम्हारा॥
तासु दरस नहिं पैहो पूता। यह मैं बचन कहौं निज गूता॥
शक्ति ने मन में विचार किया कि ब्रह्मा मेरी बात नहीं मान रहा है, क्योंकि वेद ने इसे उपदेश किया है। तब अष्टंगी ने कहा कि अलख निरंजन तुम्हारा पिता है, पर तुम उसका दर्शन नहीं पा सकते।
ब्रह्मा सुनि व्याकुल है धावा। परसन सीस ध्यान हिय लावा॥
ब्रह्मा चले जननी सिर नाई। सीर परसि आवों तोहि ठाई॥
तुरतहि ब्रह्मा दीन्ह रिंगायी। उत्तर दिशा बेगि चलि जायी॥
यह सुन ब्रह्मा व्याकुल होकर दौड़ा, माता से कहा कि पिता के शीश के दर्शन करके फिर तेरे पास आऊँगा और यह कह वह उत्तर दिशा की ओर चला गया।
जेहि खोजत ब्रह्मा थके, सुर नर मुनि अरु देव।
कहैं कबीर सुन साधवा, करु सतगुरु की सेव॥
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