Skip to content
SarvaKosh
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

Page 51 of 144

Read in context
Page 51

अनुरागसागर वाणी

51

प्रथम तुम मुहि दीन भुलावा । अब तुम कहो न दरस दिखावा ॥
तासु दरस न पैहो पूता । ऐसी बात कहो अजगूता ॥

ब्रह्मा ने कहा कि मैं नहीं मानूँगा, मुझे बताओ कि वो कहाँ है, क्योंकि पहले भी तुमने कहा कि नहीं है, फिर कहती हो कि दिखाई नहीं देता।

शक्ति ने कहा

कहे जननी सुनो ब्रह्मा, कहों तोसों सत्त ही ॥

सात स्वर्ग हैं माथ ताको, चरण पताल सप्त ही ॥

शक्ति ने कहा—हे ब्रह्मा! मैं तुमसे सच कहती हूँ, सात स्वर्ग तक उसका मस्तक है और सात पाताल तक उसके चरण हैं।

लेहु पुष्प तुम हाथ, जो इच्छा तिहि दरश की ।

जाय नवओ माथ, ब्रह्मा चलै शिर नाइ कै ॥

माता ने उसे फूल देते हुए कहा कि यदि तुम्हें पिता दर्शन की इच्छा है तो यह फूल लो और जाकर माथा टेकना और फूल चढ़ाना। तब ब्रह्मा फूल लेकर आकाश में पिता की खोज में चला।