अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
Devanagarihipublished144 pages
Page 42 of 144
Read in contextPage 42
42
साहिब बन्दगी
निरंजन ने कहा कि जीव और बीज तुम्हारे पास हैं और ये तीनों पुत्र भी तुम्हें सौंपता हूँ। अब मैं निराकार रूप में शून्य में समाऊँगा और मन बनकर हर जीव के साथ रहूँगा और तुम तीनों पुत्रों के साथ राज्य करना। निरंजन ने कहा कि तुम मेरा भेद किसी से नहीं कहना, मेरा दर्शन तीनों पुत्रों में से कोई नहीं कर सकेगा, चाहे मुझे खोजते हुए जन्म क्यों न गँवा दै, और मेरा कोई भेद भी न जान पाए। जब ये बड़े हो जाएँ तो इन्हें समुद्र मंथन के लिए भेजना।
मन ही सरूपी देव निरंजन, तोहि रहा भरमाई।
पांच पचीस तीन का पिंजड़ा, जामें तोहि राखा भरमाई॥