अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
Devanagarihipublished144 pages
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निरंजन मन बनकर गुप्त हुआ
कहे उ बहुत बुझाय देविहि, गुप्त भये तब आहि हो।
शून्य गुफहि निवास कीन्हो, भेद लह को ताहि हो ॥
वह गुप्त भा पुनि संग सबकैं, मन निरंजन जानिये।
मन पुरुष ध्यान उच्छे द देवै, आपु परगट आनिये ॥
निरंजन गुप्त होकर शून्य में समा गया और मन रूप में सबके साथ हो गया। यही मन परम पुरुष का ध्यान नहीं करने देता है।
जीव सतावे काल, नाना कर्म लगाय के।
आप चलावे चाल, कष्ट देय पुनि जीव को ॥
काल स्वयं ही चाल चलकर जीवों से कर्म करवाता है और फिर स्वयं ही उन्हें कष्ट देता है।
गुप्त भयो है संग सबके।
मन ही निरंजन जानिये ॥
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