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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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त्रिदेव की उत्पत्ति

गुन तत सम कर देविहिं दीन्हा। आपन अंस उत्पन कीन्हा।।
बुन्द तीन कन्या भग डारा। ता सँग तीनों अंस सुधारा।।
पाँच तत्व गुण तीनों दीन्हा। यहि विधि जग की रचना कीन्हा।।
प्रथम बुन्द ते ब्रह्मा भयऊ। रज गुण पंच तत्व तेहि दयऊ।।
दूजो बुन्द बिस्तु जो भयऊ। सतगुण पंच तत्व तिन पयऊ।।
तीजे बुन्द रुद्र उत्पाने। तमगुण पंच तत्व तेहि साने।।
पंच तत्व गुण तीन खमीरा। तीनों जन को रच्यो शरीरा।।

तीन गुण और पाँच तत्वों को मिलाकर निरंजन ने अपने पुत्र उत्पन्न किये और इस तरह पाँच तत्व और तीन गुण देकर जगत की रचना की। प्रथम रजगुण के साथ पाँच तत्व दिये, जिससे ब्रह्मा जी हुए और सतगुण के साथ पाँच तत्व दिये तो विष्णु जी हुए और तमगुण के साथ पाँच तत्व देने से शिवजी हुए। इस तरह पाँच तत्व और तीन गुण से तीनों शरीरों की रचना की।

कहै धर्म कामिनि सुन बानी। जो मैं कहूँ लेहू सो मानी।।
जीव बीज आहै तुव पासा। सो ले रचना करहु प्रकाशा।।
कहै निरंजन पुनि सुनु रानी। अब अस करहु आदि भवानी।।
त्रय सुत सौंप तोहि दीना। अब हम पुरुष सेवा चित लीन्हा।।
राज करहु तुम लै तिहुँवारा। भेद न कहियो काहु हमारा।।
मोर दरश त्रय सुत नहिं पैहैं। जो मुहि खोजत जन्म सिरैहैं।।
ऐसो मता दिदैहो जानी। पुरुष भेद नहिं पावै प्रानी।।
त्रय सुत जबहिं होहिं बुधवाना। सिंधु मंथन दे पटहु निदाना।।

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