Skip to content
SarvaKosh
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

Page 40 of 144

Read in context
Page 40

40

साहिब बन्दगी

आद्य शक्ति तब हँसते हुए उसके साथ एकमत हो गयी, उसकी बात मान ली और मीठी बाणी बोलकर गुप्त बात कही और निरंजन के साथ रहने का निश्चय कर लिया।

भग न कन्या के हती। अस चरित कीन्ह निरंजना।

नख घात किये भग द्वार तत छिन, घाट उत्पति गंजना॥

नख रेश शोनिता चला। तिहुँको सब खास आरंभनी।

आदि उत्पति सुनहु धर्मनि, कोउ नहिं जानत जम मनी॥

त्रियवार कीन्ही रति तबै, भये ब्रह्मा विष्णु महेश हो।

जेठे विधि विष्णु लघु तिहि, तीजे शम्भू सेष हो॥

उत्पति आदि प्रकाश, यह विधि तेहि प्रसंग भो॥

कीन्हो भोग विलास, इक मति कन्या काल है॥

तेहि पीछे ऐसा भो लेखा। धर्मदास तुम करौ विवेका॥

अग्नि पवन जल महि अकाश। कूर्म उदर ते भयो प्रकाश॥

पाँचों अंस ताहि सन लीन्हा। गुण तीनों सीसन सों कीन्हा॥

यहि विधि भये तत्व गुण तीनों। धर्मराय तब रचना कीनो॥

साहिब धर्मदास से कहते हैं कि कूर्म जी के पेट से पाँच तत्व निकले थे और उसके तीन शीश निरंजन ने खा लिये थे, उन्हीं से तीन गुण-रजगुण (ब्रह्मा जी), सत्गुण (विष्णु जी), और तमगुण (शिवजी) हुए। पाँच तत्व और तीन गुणों से निरंजन ने सब रचना की।