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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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अनुरागसागर वाणी

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आद्य शक्ति ने कहा

कहे कन्या कैसे बोलहु बानी । भ्राता जेठ प्रथम हम जानी ॥
कन्या कहैं सुनो हो ताता । ऐसी विधि जनि बोलहु बाता ॥
अब मैं पुत्री भई तुम्हारी । ताते उदर माँझ लियो डारी ।
जेठ बंधु प्रथमहि के नाता । अब तो अहो हमारे ताता ॥
निरमल दृष्टि अब चितवहु मोही । नहीं तो पाप होय अब तोही ॥

आद्य शक्ति ने कहा कि यह कैसी बात बोल रहे हो । पहले नाते से तो तुम मेरे बड़े भाई हो चुके हो, क्योंकि परम-पुरुष के बच्चे हैं हम और दूसरे नाते से मैं तुम्हारी पुत्री हो गयी हूँ, क्योंकि तुमने मुझे पेट में डाल लिया था और वहीं से मैं निकली हूँ, इसलिए तुम मेरे पिता हो गये हो । अब तुम मुझे निर्मल दृष्टि से देखो अन्यथा तुम्हें पाप लगेगा ।

निरंजन ने कहा

कहे निरंजन सुनो भवानी । यह मैं तोहि कहों सहिदानी ॥
पाप पुण्य डर हम नहीं डरता । पाप पुण्य के हमहीं करता ॥
पाप पुण्य हमहीं से होई । लेखा मोर न लेहैं कोई ॥
पाप पुण्य हम करम पसारा । जो बाझे सो होय हमारा ॥
ताते तोहि कहों समुझाई । सिख हमार लो सीस चढ़ाई ॥
पुरुष दीन तोहि हम कहैं जानी । मानहु कहा हमार भवानी ॥

निरंजन ने कहा कि मैं पाप-पुण्य से नहीं डरता हूँ, क्योंकि पाप-पुण्य का कर्ता मैं ही हूँ, मेरे पाप-पुण्य का हिसाब लेने वाला कोई नहीं है और आगे मैं पाप-पुण्य कर्मों का जाल ही फैलाऊँगा और जो इनमें उलझ जायेगा, वो कहीं नहीं जा पायेगा, हमारा ही रहेगा ।

विहँसी कन्या सुन अस बाता । इक मति होय दोह रंगराता ॥
हरस वचन बोली मृदु बानी । नारी नीच बुधि रति विधि ठानी ॥
रहस वचन सुन धरम हरषाना । भोग करन को मन में आना ॥