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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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अनुरागसागर वाणी

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साहिब धर्मदास से कहते हैं कि मैंने फिर पुनः संसार में आकर सुपच सुदर्शन को चेताया, नाम दिया। तब द्वार का अंतिम समय था।

धर्मन पुनि आये जगमाहीं । रानी पति लै गये तहांहीं ॥

राख्यो ताहि लोक मँझारा । ततछिन पुनि आयउ संसारा ॥

काशी नगर कहाँ चलि आये । नाम सुदरशन सुपच जगाये ॥

रानी के पति को वहाँ पहुँचाकर साहिब फिर संसार में आए और काशी नगर के सुपच को जगाया। वो बड़ा भक्त हुआ। जब पाण्डव कौरव युद्ध समाप्त हुआ तो कृष्ण ने पाण्डवों को बन्धुओं को मारने के अपराध में यज्ञ करने को कहा। यज्ञ में आकाश में एक घण्टा स्थित किया गया, कृष्ण ने कहा-

पाण्डव प्रति बोले यदुपाला । पूरन यज्ञ जान तिहिं काला ॥

घण्ट अकाश बजत सुनि आवे । यज्ञ को फल पूरन पावे ॥

भोजन विविध प्रकार बनाई । परम प्रीति से सबहिं जेबाई ॥

इच्छा भोजन सब मिलि पावा । घंट नहिं बाजा राय लजावा ॥

भोजन कीन सकल ऋषि राया । बजी न घंट भूप भ्रम आया ॥

कृष्ण ने कहा कि यदि घण्टा बजा तो समझना कि यज्ञ सफल हुआ।

यज्ञ हुआ, सभी ब्राह्मणों, ऋषियों-मुनियों, संयासियों को भोजन करवाया गया, पर घण्टा नहीं बजा। तब राजा लज्जित हुआ और कृष्ण के पास सब पाण्डव गये और पूछा-

करिके कृपा कहो यदुराजा । कारण कौन घंट नहिं बाजा ॥

कृष्ण अस कारण तासु बताया । साधू कोई न भोजन पाया ॥

पाण्डवों ने कृष्ण से पूछा कि घण्टा क्यों नहीं बजा, तो कृष्ण जी ने कहा कि किसी साधू ने भोजन नहीं किया है।

चकित भै तब पाण्डव कहै ई । कोटिन साधु भोजन लहे ऊ ॥

अब कहँ साधु पाइय नाथा । तिनते तब बोले यदुनाथा ॥