अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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साहिब बन्दगी
तब साहिब उसे अपने साथ अमर लोक ले गये। जब मानसरोवर, अमृत सरोवर, सुरति का सागर देखकर रानी अमर लोक पहुँची तो लोक की शोभा देख बहुत प्रसन्न हुई। सभी हँसों ने रानी का सम्मान किया, कहा कि तुमने सतगुरु को पहचाना, तुम धन्य हो, तुम्हारा कष्ट अब समाप्त हुआ। तब साहिब ने इन्द्रमती से कहा कि अब परम पुरुष के दर्शन को चलो। सभी हँस भी खुशी-2 साथ हो लिये कि अब परम पुरुष के दर्शन होंगे। तब साहिब के कहने पर परम पुरुष ने दर्शन दिये।
पुरुष कांति जब देखउ रानी। अद्भुत अमी सुधा की खानी ॥
गदगद होय चरण लपटानी। हँस सुबुद्धि सुजन गुणज्ञानी ॥
परम पुरुष की शोभा देख रानी गद्गद हो गयी और चरणों में लिपट गयी। परम पुरुष ने रानी से कहा कि करुणामय को बुला लाओ। जब रानी साहिब के पास आई तो देखकर चकित हो गयी कि साहिब ही परम पुरुष हैं, उनमें और परम पुरुष में कोई अन्तर नहीं है। तब रानी ने कहा-
कह रानी यह अचरज आही। भिन्न भाव कछु देखों नाहीं ॥
जो कोइ कला पुरुष कहै देखा। करुणामय तन एक विसेखा ॥
धाय चरण गह हँस सुजाना। हे प्रभु तव चरित्र सब जाना ॥
तुम सतपुरुष दास कहलाये। यह शोभा कस उहाँ छिपाये ॥
मोरे चित्त यह निश्चय आई। तुमहि पुरुष दूजा नहिं भाई ॥
रानी ने कहा कि मुझे आपमें और परम पुरुष में कोई अन्तर नहीं दिखा, अब मैं आपका चरित्र समझ चुकी हूँ, आप सतपुरुष होकर दास कहलाते हैं और अपना असली रूप छिपाए रखते हैं, पर मुझे निश्चय हो गया है कि आप परम पुरुष ही हैं, अन्य नहीं हैं।
तब रानी ने राजा को भी वहाँ लाने की विनती की, कहा-वे काल के मुख में जा रहे हैं, उन्होंने मुझे कभी संतों की सेवा में रुकावट नहीं दी। तब विनती मान साहिब गढ़गिरनार में आए और राजा को लेकर अमर लोक पहुँचे।