अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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साहिब बन्दगी
सकल जीव हैं साहिब केरा । मोह विविश जिव परे अंधेरा ॥
सब घट पुरुष अंश कियो वासा । कहीं प्रगट कहिं गुप्त निवासा ॥
साहिब ने रानी से कहा कि अब मैं तुम्हें काल से ज़रूर छुड़ाऊँगा, तुम्हें नाम दूँगा। इसलिए अब आरति का सामान लाकर आरति करो, जिससे यम दूर भाग जाए। मुझे राज पाट, धन धौलत से कुछ नहीं लेना। सब जीव साहिब के हैं और मोह वश इस संसार में पड़े हुए हैं, मैं उन्हें लेने आया हूँ।
इन्द्रमती ने कहा
इन्द्रमती सुन वचन अमानी । बोली मधुर ज्ञान गुण बानी ॥
मोहि अधम को तुम सुख दीन्हा । तुव प्रसाद आगम गम चीन्हा ॥
हे प्रभु चीन्ह तोहि अब पाहू । निश्चय सत्य पुरुष तुम आहू ॥
सत्य पुरुष जिन लोक सँवारा । करेहु कृपा सो मोहि उदारा ॥
आपन हृदय अस हम जाना । तुमते अधिक और नहिं आना ॥
अब भाषहु प्रभु आरति भाऊ । जो चाहिय सो मोहि बताऊ ॥
रानी ने कहा कि अब मुझे विश्वास हो गया है कि आप परम-पुरुष ही हैं। इसलिए अब मेरे लिए आपसे बड़ा और कोई नहीं है। कृपा करके अब मुझे बताएँ कि आरति के लिए क्या-क्या चाहिए।
साहिब ने कहा
हे धर्मन सो ताहि सुनावा । जस खेमसरी सो भाषेठ भावा ॥
चौका कर लेवहु परवाना । पाछे कहीं अपन सहिदाना ॥
आनेउ सकल साज तब रानी । चौका बैठि शब्द ध्वनि ठानी ॥
आरति कर दीन्हा परवाना । पुरुष ध्यान सुमिरण सहिदाना ॥
उठि रानी तव माथ नवायी । ले आज्ञा परवाना पायी ॥
साहिब धर्मदास से कहते हैं कि जैसे मैंने खेमसरी को आरती बतायी थी, वैसे ही रानी को भी बतायी। रानी सब सामान लेकर आयी और आरती करके नाम लिया।