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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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अनुरागसागर वाणी

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पुनि रानी राजहि समुझावा। हे प्रभु बहुरि न ऐसो दावा।।
गहो शरण जो कारज चाहो। इतना वचन मोर निरवाहो।।

रानी ने फिर राजा को भी समझाया कि साहिब की शरण में आ जाओ, कल्याण हो जायेगा।

राजा ने कहा

तुम रानी अरधंगी सोई। हम तुम भक्त होय नहिं दोई।।
तोरि भक्ति कर देखो भाऊ। किहि विधि मोहि लेहु मुक्ताऊ।।
देखो तोरि भक्ति परतापा। पहुँचो लोक मिटे संतापा।।

राजा ने रानी से कहा कि तुम मेरी अंधांगिनी हो, तुम्हारी भक्ति के प्रताप से मेरा भी कल्याण हो जायेगा।

साहिब ने रानी से कहा

रानी बहुरि मोहि पहँ आई। हम तिहि काल चरित्र लखाई।।
सुन रानी इक वचन हमारा। कालहु कला करे छल धारा।।
तो कह शिष्य कीन हम जानी। डसे काल तच्छक है आनी।।
अब हम तोकहँ मंत्र लखाओं। काल गरल सब दूर भगाओं।।
दीन्हो शब्द विरहु ली ताही। काल गरल जेहि व्यापे नाहीं।।
पुनि यम दूसर छल तोहि ठानी। सो चरित्र मैं कहों बखानी।।
छल कर यम आये तुम पासा। सो तुहि भेद कहों परगासा।।
हँ स वर्ण वह रूप बनायी। हम सम ज्ञान तोहि समझायी।।
तुम सन कहे चीन्ह मुहिं रानी। मरदन काल नाम ममज्ञानी।।
यहि विधि काल ठगे तोहि आयी। काल रेख सब देउँ बतायी।।
मस्तक छोट काल कर जानू। चक्षु गुंजन को रंग बखानू।।
काल लक्षण मैं तोहि बतायी। और अंग सब सेत रहायी।।

रानी पुनः साहिब के पास आयी। तब साहिब ने उसे काल चरित्र समझाया, कहा-तुमने मेरा नाम ले लिया है, यह जान काल तुम्हें सौंप