अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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सतयुग सत् सुकृत त्रेता मुनीन्द्र । द्वापर करुणामय नाम धराये ॥
युगन युगन हम यहाँ चले आये । जो चीन्हा तहाँ लोक पठाये ॥
साहिब ने कहा कि मेरा देश तीन लोक से परे है, वहाँ यम प्रवेश नहीं कर सकता, वहाँ आदि पुरुष का निवास है। सत्य लोक की बात ऐसी है कि करोड़ों सूर्य चन्द्र उस परम पुरुष के मात्र एक रोम से लजा जाएँ और आत्मा का प्रकाश 16 सूर्यों का है। क्या कहूँ, वहाँ की बात कुछ कही नहीं जा सकती है; जो वहाँ पहुँचता है, उसका बड़ा भाग्य है। उसी देश से मैं आया हूँ और यहाँ आकर करुणामय नाम धराया है। वास्तव में मैं हर युग में आता हूँ; सतयुग में सतसुकृत, त्रेता में मुनीन्द्र और द्वापर में करुणामय नाम से मैं यहाँ आया हूँ और जिसने मेरी बात को समझा, विश्वास किया, उसे मैंने वहाँ पहुँचाया है।
इन्द्रमती ने कहा
जोरि पाणि बोली बिलखायी । हे प्रभु यम ते लेहु छुड़ाई ॥
राज पाट सब तुम पर वारों । धन सम्पति यह सब तजि डारों ॥
देहु शरण मुहिं दीनदयाला । बंदिछोर मुहिं करहु निहाला ॥
रानी ने साहिब से कहा—हे प्रभु! यम से छुड़ा लो। कहा कि यह राज पाट सब मैं तुम पर वार देती हूँ, यह धन—धौलत यह त्याग देती हूँ, मुझे अपनी शरण में लेकर काल के जाल से मुक्त कर दो।
साहिब ने कहा
इन्द्रमती सुन वचन हमारा । छोरों निश्चय बंदि तुम्हारा ॥
चीन्हउ मोहि परतीत दूढ़ाना । अब देहुँ तोहि नाम परवाना ॥
करहु आरती लेवहु परवाना । भागे यम तब दूर पयाना ॥
चीन्हों मोहि करो परवाती । लेहु पान चलुभौ जल जीती ॥
आनहु जो कछु आरति साजा । राजपाट कर मोहि ना काजा ॥
धनसंपति कछु मोहि ना भावा । जीव चितावन यहि जग आवा ॥
धन सम्पति तुम यहँवा लायी । करहु संत सम्मान बनायी ॥