Skip to content
SarvaKosh
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

Page 120 of 144

Read in context
Page 120

120

साहिब बन्दगी

जीव परम पुरुष के अंश हैं, जिन्हें काल पुरुष ने अपने भ्रम जाल में फँसाकर रोके रखा है। मैं जीवों को काल के फँदे से छुड़ाने आया हूँ। जो जीव मुझे पहचान कर मेरी शरण में आ जाते हैं, उन्हें मैं इस संसार से मुक्त करके ले जाता हूँ। काल ने जीवों को धोखे में रखा हुआ है। पवन, पानी आदि नाशवान तत्वों से देही का निर्माण किया है, पर मेरी देही इन चीजों से न्यारी है; मेरी शब्द की देही है। यह मैंने संक्षेप में थोड़ा बताया है, अब तुम इसे परख लो।

इन्द्रमती ने पूछा

हे प्रभु अस अचरज मोहि होई। अस सुभाव दूजा नहीं कोई॥
कौन आहु कहँवाते आये। तन अर्चित प्रभु कहँवा पाये॥
कौन नाम तुम्हरो गुरु देवा। यह सब वरण कहो मोहि भेवा॥
हम का जानहिं भेद तुम्हारा। ताते पूछों यह व्यवहारा॥

रानी ने कहा कि मुझे एक अचरज हो रहा है कि ऐसी देही तो और किसी की नहीं सुनी, इसलिए कृपा करके मुझे बताओ कि आप कहाँ से आए हैं, यह देही आपने कहाँ से पाई है, आपका नाम क्या है! यह सब मुझे बताओ। मैं आपका भेद नहीं जानती हूँ, इसलिए यह सब पूछ रही हूँ।

इन्द्रमती कथा सुन सुहावन। तोहि समझाय कहों गुण पावन॥
देश हमार न्यार तिहुँ पुर ते। अहि पुर नर पुर अरु सुर पुर ते।
तहाँ नहीं यम केर प्रवेशा। आदि पुरुष को जहवाँ देशा॥
सत्य लोक की ऐसी बाता। कोटि शशि इक रोम लजाता॥
ऐसी पुरुष कांति उजियारा। हँसन शोभा कहों बिचारा॥
एक हँस जस षोडश भाना। अग्र वासना हँस अघाना॥
कहा कहों कछु कहत न आवे। धन्य भाग जे हँस सिधावे॥
ताहि देश ते हम चलि आये। करुणामय निज नाम धराये॥