अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
Page 114 of 144
Read in context114
साहिब बन्दगी
हे साहिब मोहि लीजे शरणा। मेटहु मोर जन्म अरु मरणा॥
दीन्हों ताहि पान परवाना। पुरुष डोर सौँप्यो सहिदाना॥
मंदोदरी ने जब साहिब के शब्द सुने तो उसका भ्रम दूर हो गया, उसका हृदय स्वच्छ हो गया और प्रेम उमड़ आया, उसने कहा—हे साहिब! मुझे अपनी शरण में लेकर जन्म मरण से दूर कर दो। तब साहिब ने उसे नाम दिया।
तब मैं रावण पहुँ चलि आओ। द्वारपाल सों वचन सुनायो॥
तोसों एक बात समुझाई। राजा कहँ तुम आव लिवाई॥
साहिब तब रावण के महल में पहुँचे और द्वारपाल से कहा कि रावण को संदेश दो कि कोई साधु आया है, आकर उसे महल में ले आओ।
द्वारपाल ने कहा
द्वारपाल तब विनती लाई। महा प्रचण्ड है रावण राई॥
महागर्व अरु क्रोध अपारा। कहों जाय मोहि पल में मारा॥
द्वारपाल ने कहा कि रावण बड़ा प्रचण्ड है, शक्तिशाली है, उसमें बड़ा क्रोध और अभिमान भी है, यदि उससे ऐसी बात कहूँगा तो मुझे वहीं मार देगा।
साहिब ने कहा
मानहु वचन जाव यहि बारा। रोम बंक नहिं होय तुम्हारा॥
सत्य वचन तुम हमरा मानो। रावण जाय तुरत तुम आनो॥
साहिब ने कहा कि तुम्हारा बाल भी बाँका नहीं होगा, मेरा वचन सत्य मानो और तुरंत रावण को यह संदेश देकर आओ।
ततक्षण गा प्रतिहार जनायी। द्वै कर जोरे ठाढ रहाई॥
सिद्ध एक तो हम पहुँ आई। तेकह राजहि लाव बुलाई॥
तभी द्वारपाल अन्दर गया और दोनों हाथ जोड़ रावण से कहा कि एक सिद्ध आया है, कहता है कि राजा रावण को बुलाओ।