अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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कह्यो ताहि आरति को लेखा । खेमसरिहि जस भाषेउ रेखा ॥
तृण तोर बीरा तिहि दीन्हा । ताकैं गृह में काहु न चीन्हा ॥
सुमिरन ध्यान ताहि सो भाखा । पुरुष डोर गाय नहिं राखा ॥
साहिब चारों दिशाओं में फिरकर लंका में आए तो विचित्र नाम का
भाट मिला, उसने साहिब की बात को समझा और अधीन होकर चरणों
पर गिर पड़ा, कहा कि मेरे जीव का आज कल्याण करो। तब साहिब ने
उसे नाम दिया और खेमसरी की भाँति आरती करना बताया, ध्यान
सुमिरन करना बताया।
तब विचित्र की स्त्री रानी मंदोदरी के पास गयी और कहा कि कोई
साधु आया है, बहुत सुंदर है, श्वेत वस्त्र धारण किए हैं। ऐसा साधु कभी
नहीं देखा। तब मंदोदरी आयी और देखकर चकित हुई, विनती की—
कहे मँदोदरी शुभ दिन मोरा । विनती करों दोई कर जोरा ॥
ऐसा तपसी कबहुँ न देखा । श्वेत अंग सब श्वेतहि भेखा ॥
हे समरथ मोहिं करहु सनाथा । भव बूढ़त गहि राखो हाथा ॥
तब मंदोदरी ने विनती की, कहा कि ऐसा तपस्वी तो कभी नहीं
देखा। वो प्रभावित हुई, कहा कि मुझे सनाथ करो, भवसागर में डुबने से
बचा लो।
सुनहु वधू प्रिय रावण केरी । नाम प्रताप कटे यम बेरी ॥
ज्ञान दृष्टि सो परखहु आई । खरा खोट तोहि देउँ चिन्हाई ॥
पुरुष अमान अंजर मनि सारा । सो तो तीन लोक ते न्यारा ॥
तेहि साहिब कहँ सुमिरे कोई । आवागमन रहित सो होई ॥
साहिब ने मंदोदरी से कहा कि नाम की ताकत से ही यम का बंधन
कट सकता है। ज्ञान दृष्टि से परखो, तुम्हें अच्छे बुरे की पहचान बताता
हूँ, जो सत्य पुरुष है, वो तीन लोक से न्यारा है, जो उस साहिब का
सुमिरन करता है, उसका आवागमन मिट जाता है।
सुनतहि शब्द तासु भ्रम भागा । गह्यो शब्द शुचि मन अनुरागा ॥