अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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सुन नृप क्रोध कीन्ह तेहि बारा । मैं मति हीन आहि प्रतिहारा ॥
यहि मति ज्ञान हरोँ किन तोरा । जो तैं मोहि बुलावन दौरा ॥
दर्श मोर शिवसुत नहिं पावत । मैं कह भिक्षुक कहा बुलावत ॥
रावण ने क्रोधित हो कहा—हे द्वारपाल ! तेरी बुद्धि का किसने हरण कर लिया, जो तू मुझे बुलाने आया है, मेरा दर्शन शिवजी के पुत्र भी नहीं पा सकते, फिर तू मुझे कहने आया है कि भिक्षु बुला रहा है ।
रावण चला शस्त्र लै हाथा । तुरत जाय तिहि काटों माथा ॥
मारों ताहि सीस खसि परयी । देखों भुक्षुक मोर का करयी ॥
जहँ मुनीन्द्र तहँ रावण राई । सत्तर बार अस्त्र कर लाई ॥
लीन्ह मुनीन्द्र तृण कर ओटा । अति बल रावण मारै चोटा ॥
रावण ने क्रोध में आकर हाथ में तलवार ली, सोचा, अभी उसका शीश काट देता हूँ, देखता हूँ कि वो मेरा क्या करता है । रावण ने आकर 70 बार तलवार चलायी, पर साहिब एक तिनके पर उसका वार रोक देते थे । रावण ने बड़े बल का प्रयोग किया, पर कुछ न बना ।
तृण ओट यहि कारणे है , गर्व धारी राय हो ॥
तेही कारणे यह युक्ति कीन्ही, लाज रावण आय हो ॥
साहिब ने तिनके का सहारा इसलिए लिया, क्योंकि रावण बड़ा घमण्डी था, उसे शर्म आ सके , उसका घमण्ड चूर हो सके ।
रावण को अमान करि, तब अवध नगरहि आय ।
दशा संत की जान के , मधुकर पकरै पाय ॥
रावण का घमण्ड तोड़ फिर साहिब अवध में आए, वहाँ मधुकर ब्राह्मण मिला, वो साहिब के चरण पकड़ उन के अधीन हुआ ।
देख्यो ताहि बहु त लवलीना । तासों कह्यो ज्ञान को चीन्हा ॥
पुरुष संदेश कहेउ तिहिं पास । सुनत बचन जिय भयउ हुलासा ॥