अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
by स्वामी मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextसत्ययुग के हंस
धर्मदास सुन सत्ययुग भाऊ। जिन जीव को नाम सुनाऊ॥
नृप धोंधल पहुँ हम चलि गयऊ। सत्य शब्द सो ताहि सुनयऊ॥
तिन शब्द हमारो सत्य माना। दीन्ह तिनको मैं पान परमाना॥
साहिब ने कहा—हे धर्मदास! अब जिन जीवों को मैंने शब्द सुनाया, उनका नाम बताता हूँ। सबसे पहले राजा धोंधल को मैंने अपने सत्य शब्द का भेद सुनाया तो उसने सत्य करके माना और उसे मैंने नाम(शब्द) दिया।
धोंधल शब्द चिताय, तब आयउ मथुरा नगर।
खेमसरी आयो धाय, नारि वृद्ध गोवालि सों॥
साहिब कहते हैं कि धोंधल राजा को शब्द से चिताकर फिर मथुरा नगर में आया, वहाँ वृद्ध ग्वालिन खेमसरी रहती थी। मुझे देख वो दौड़कर मेरे पास आ गयी।
कहे खेमसरी पुरुष पुराना। कहँवा ते तुम कीन्ह पयाना॥
तासों कहे उ शब्द उपदेसा। पुरुष भाव अरु यम को भेसा॥
खेमसरी ने कहा कि तुम कहाँ से आए हो? तुम परम पुरुष और काल की बातें कर रहे हो।
पै धोखा इक ताहि रहाई। देखे लोक तब मन पतियाई॥
राखेउ देह हंस लै धावा। पल इक माहिँ लोक पहुँचावा॥
लोक दिखाय हंस लै आयो। देह पाय खेमसरी पछतायो॥
हे साहिब लै चलु वहि देश। यहाँ बहुत है काल कलेशा॥
खेमसरी कुछ संशय में थी तो साहिब ने उसे अमर लोक ले जाकर उसका धोखा मिटा दिया, उसे विश्वास हो गया। जब वापिस आए तो वो पछताने लगी, कहने लगी कि वहीं ले चलो, यहाँ बहुत कष्ट हैं।
तासों कहँ सुनो यह बानी। जो मैं कहूँ लेहु सो मानी॥
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