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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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राम नाम का रहस्य

साहिब कहते हैं

ब्रह्मा विष्णु शिव सनकादी । सब मिलि कीन्ह शून्य समाधी ॥
कवन नाम सुमिरो करतारा । कवन नाम ध्यान अनुसार ॥
सबहिं शून्य महँ ध्यान लगाये । स्वाति नेह सीप ज्यों लाये ॥
तबहिं निरंजन जतन बिचारा । शून्य गुफा ते शब्द उचारा ॥
ररां सु शब्द उठा बहु बारा । मा अक्षर माया संचारा ॥
दोउ अक्षर कहँ सम कै राखा । राम नाम सबहिन अभिलाखा ॥
रामनाम लै जगहि दृढ़ायो । काल फन्द कोइ चीन्ह न पायो ॥

साहिब धर्मदास से कहते हैं कि सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सनकादि ने मिलकर विचार किया कि परमात्मा का कौन सा नाम जपें, किस नाम से उसका ध्यान करें। तब सबने मिलकर शून्य में समाधि लगायी। ऐसे में निरंजन ने शून्य गुफा से ररां शब्द उच्चार और माया ने मा शब्द उच्चार। दोनों को मिलाया गया और राम नाम को चुना गया। सभी राम नाम का जाप करने लगे, पर काल के फंदे को कोई समझ नहीं पाया।

इस तरह राम शब्द में निरंजन और माया दोनों आ गये। इसलिए सत्य नाम इससे परे है।

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