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अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

by स्वामी मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished144 pages

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अनुरागसागर वाणी

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जबलौं ठीका पूर न आई। तब लग रहो नाम लौं लाईं ॥
तुम तो देखा लोक हमारा। जीवन को उपदेसहु सारा ॥
एकहु जीव शरणागत लावे। सो जीव सत्पुरुष को भावे ॥
जैसे गऊ बाघ मुख जायी। सो कपिलहि कोउ आय छुड़ायी ॥
ता नर को सब सुयश बखाने। गऊ छुड़ाय बाघ ते आने ॥
एक जीव को भक्ति दृढ़ावे। सो कोटिक गऊ पुण्य सो पावे ॥

साहिब ने कहा कि जब तक जीवन की अवधि पूरी नहीं हो जाती, नाम में लौ लगाए रखो। तुमने तो हमारा लोक देख लिया, अब दूसरों को समझाकर इस सत्य भक्ति में लगाओ, जो एक भी जीव को शरणागत लाता है, वो परम पुरुष को बड़ा अच्छा लगता है। जैसे भोली-भाली गाउँ शेर के मुख में जाती है, पर जो गाय को शेर से छुड़ा लाता है, सब उसकी प्रशंसा करते हैं कि गाय को शेर से छुड़ा लाया। ऐसे ही जो एक जीव को भी काल पुरुष की भक्ति से छुड़ाकर सत्य भक्ति में लगा देता है, वो करोड़ों गाय को बचाने का फल पाता है।

खेमसरी परै चरण पर आयी। हे साहिब मोहि लेहु बचायी ॥
मो पर दाय करहु प्रकाशा। अब नहिं परौं काल की फाँसा ॥

खेमसरी चरणों पर गिर पड़ी, कहा-हे साहिब! मुझे काल से बचा लो।

सुन खेमसरी यह यम को देश। बिना नाम नहिं मिटै अदेशा ॥

पुरुष नाम बीरा जो पावे। फिरके भवसागर नहिं आवे ॥

साहिब ने खेमसरी से कहा कि यह काल का देश है; बिना नाम के संशय नहीं मिटने वाला; जो परम पुरुष का गुप्त नाम पा जाता है, वो फिर भवसागर में नहीं आता।

कह खेमसरी परवाना दीजे। यम सों छोरि आपन करि लीजे ॥

और जीव हमरे गृह आही। नाम पान प्रभु दीजै ताही ॥

खेमसरी ने कहा कि अब नाम रूपी परवाना देकर यम से छुड़ा लो, अपना बना लो, और भी जो जीव मेरे घर में हैं, उन्हें भी नाम दो। तब साहिब उसके घर गये और सबको नाम दिया, आरती करने की विधि भी समझायी। सत्ययुग में साहिब ने चार हंसों को अमर लोक पहुँचाया।