अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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पर दिल्ली के मुसलमानों का बड़ा अभिमान था। वे
समझते थे कि तानसेन दिल्ली दरबार में सर्वश्रेष्ठ पुरुष है।
परन्तु वीरबलको इससे भी बड़े पद पर देखकर उनको बड़ा
क्षोभ उत्पन्न होता था। वे हमेशा बीरबल को गिराने की ताक
में लगे रहते थे। यहाँ तक कि छिपे तौर से समय समय पर
बादशाहके सामने तानसेन की प्रशंशा किया करते थे।
एक दिन दरबार के समय बादशाह बैठे हुये थे और
बहुत से मुसलमान दरबारी उनसे बातें कर रहे थे। एक मुस-
लमान ने मौका देखकर तानसेन की बुद्धि विशेषता पर वार्ता
छेड़ी। वह जब कभी तानसेन की बड़ाई करता तो वहाँ बीरबल
का नाम अपनी जबान पर नहीं लाता था। उसकी बराबर की
प्रशंसा सुनते सुनते बादशाह ऊब गये और मुसलमान
दरबारियों का भीतरी भाव समझकर बोले- "मैं तुम लोगों
के मुख से तानसेन की बारम्बार प्रशंसा सुना करता हूँ और
मुमकिन है कि तुम्हारा कहना सत्य भी हो, परन्तु फिर भी वह
बीरबल को बराबरी करने योग्य नहीं है।"
बादशाह के इस मार्मिक फटकार से मुसलमान दरबारियों
को बड़ा कष्ट हुआ परन्तु वे दरबार के समय और कुछ न
कहकर चुप रह गये। जब दरबार समाप्त हो गया तो वे संध्या
समय एक सरदार के यहाँ एकत्रित हुए और आपस में अन्तरंग
मीटिंग कर उस सरदारकी बैठक को तत्कालीन सामग्रियों
से खूब विभूषित किया। बैठक के मध्य में बादशाह को बैठने
के लिये एक सुवर्ण निर्मित सोनेका सिंहासन सजाकर रक्खा
गया। तानसेन भी अपने वाद्य सामग्रियों के सहित पधारे तब