अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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कई गण्यमान्य सरदार आपसमें मिलकर बादशाह के पास गये
और आग्रह कर उन्हें अपने सरदार की बैठक में ले आये। उधर
सरदार के कर्मचारियों ने बादशाह के आनेके पहले ही कमरे में
दीपकों को सजाकर रख छोड़े थे। दीपकेँ तेल बत्ती से लैसकर
बिना जलाये ही रखी गई थीं। बादशाह के आने पर तान-
ने दीपक राग गाने के आज्ञा दी गई। तानसेन के दीपक
राग छेड़ते ही सारे दीपक आपसे आप जल गये और सर-
दार की बैठक एकाएक प्रकाशित हो गई। गरमी का मौसम
था उस दिन बड़ी गरमी बढ़ रही थी। तानसेन ने देखा कि
गरमी की अधिकता से बादशाह बेचैन हो रहे हैं अतएव
तुरत मलार गाने लगा, मलार गाते ही वृष्टि होने लगी और
थोड़ी ही देर में सब गरमी शान्त हुई। ऐसी उपयुक्त वृष्टि
से सब लोग बड़े हर्षित हुए।
इन घटित घटनाओं को देखकर बादशाह को बड़ा हर्ष
हुआ। मुसलमान सरदार तो अपना मतलब गाँठने के लिये
ही यह समाज एकत्रित किये हुए थे। बादशाह को हर्षित
देखकर मुमताज उद्दीन नामी सर्वश्रेष्ठ उमराव हाथ जोड़कर
बोला-“पृथिवीनाथ! अब आपको तानसेन की बुद्धि विशेषता
पर सन्देह करने का कोई कारण शेष नहीं रह गया होगा।
आशा है कि आप आजसे तानसेन की बुद्धि को बीरबल की
बुद्धि से श्रेष्ठ मान लेंगे और न्याय की मर्यादा कायम रखने
के लिये तानसेन को बीरबल का पद प्रदान करेंगे।”
कई दूसरे सरदारों ने भी पहले सरदार की प्रार्थना का अनु-
मोदन किया। सब सरदारों की सम्मति समझ चुकने के