अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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अकबर बीरबल विनोद
दौलत ड्योढ़ी पर हाजिर है
एक दिन बादशाह किसी कार्य में त्रुटि पड़ने के कारण अपने दौलत नामी पुराने सेवक पर नाराज होकर उसे नौकरी से पृथक कर दिये। बिचारा सेवक अपनी बचत का कोई दूसरा उपाय न देखकर बीरबल के पास अपने छुटकारे के लिये गया। बीरबल उसका सारा समाचार सुनकर बोला— "तुम एक बार फिर महल में जाकर कहो कि दौलत ड्योढ़ी पर हाजिर है, हुक्म हो तो रहे वा जाय।"
सेवकने वैसा ही किया। बादशाह ने उसे बुलवाकर धीरे से समझाया—"दौलत मेरे यहाँ हमेशा कायम रहे।" बादशाह की और उस पुराने नौकर की अर्थभरी बातों को समझ कर सब दरबारी हँसने लगे। बीरबल की युक्ति से विचारे वृद्ध सेवक की जीविका बनी रह गई।
तानसेन और बीरबल की बुद्धि-परीक्षा
अकबर बादशाह का दरबार नौरत्नों से विभूषित था। उनमें एक रत्न का नाम तानसेन भी था। ये जाति का मुसलमान और गान और वाद्यविद्या में बड़े पंडित थे। इनकी गानेकी विशेष कला देश देशान्तर में फैली हुई थी, दूर देश के राजे अक्सर तानसेन के गाने को सुनने के लिये दिल्ली आते थे और उसका गान सुनकर लौट जाते थे। अपने राज्य में जाकर वे तानसेन की बड़ी प्रशंसा करते इसलिये तानसेन