अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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अकबर बीरबल विनोद
बारी २ से बुलवा कर अपने नाखून के जमने का इलाज पूछा
परन्तु जब वे निरुत्तर रह जाते, तब उन्हें तुरत जेल का हवा
खाने के लिये भेज देता।"
बादशाह की इस निष्ठुरता का समाचार क्रमशः दूर दूर
देशों में फैल गया। विचारे वैद्य हकीमों को बड़ी चिन्ता उत्पन्न
हुई। कितनों ने तो इस पेशे को त्याग कर दूसरा पेशा
अख्तियार कर लिया। बहुतेरों ने जंगल पहाड़ों में छिपकर
अपनी आत्म रक्षा की। विचारे रोगी चिकित्सकों के अभाव
में तड़प तड़पकर मरने लगे। यह घटना क्रमशः हिन्दुस्तान
के वैद्यों ने भी सुनी। वे भी डरे और चाहते थे कि इस पेशे को
त्यागकर आजीविका उपार्जन का कोई दूसरा मार्ग निकालें।
इसी बीच यह बात फूटते २ अकबर बादशाह के कानों तक
पहुँची। बादशाह को ऐसे अत्याचारों को सुनकर बड़ा कष्ट
हुआ और वे अपनी सभा बुलवा कर लोगों से दीन प्रजाकी
रक्षा का उपाय पूछे—
बीरबल बोला-“पृथिवीनाथ ! यदि मैं किसी प्रकार बाद-
शाह तक जापहुँचूँ तो कोई न कोई युक्ति लड़ाकर सब कैदियों
को मुक्त करा दूँ।" बादशाह ने इस काम को करने के लिये
बीरबल को एक मास की मुहलत दी। बीरबल वैद्य का सा
रूप बनाकर उस शहर में जा पहुँचा और गरीबों की मुफ्त
दवा करने लगा। धीरे २ वैद्यगी का सब सामान भी संग्रह कर
लिया। इसकी दवा से बहुतेरे रोगी आरोग्य हो गये। जिस
कारण इसका यश नगरमें बिजली की तरह फैलने लगा। शहर
के कितने रईसों ने बीरबलको परोक्ष में समझाया-“इस नगर