अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in contextजाऊँगा तो उससे मुलायमियत का व्योहार करूँगा।” बाद-
शाह को अपनी उच्छृंखलता पर बड़ा दुःख उत्पन्न हुआ और
अपनी तरफ से बीरबलको उसके गुरुसे क्षमाप्रार्थी होनेके लिये
भेजा। यह तो बीरबल की मनचाही बात थी। वह उसी क्षण
हनुमान जी के मन्दिर में जा पहुँचा। सूर्यास्त का समय था
और सब लोग वहाँ से चले गये थे। बीरबल लकड़हारे को
अपने घर लिवा ले गया और उसकी बहुत प्रशंसा कर
बोला-“सावधान ! यह बात कहीं प्रगट न करना, नहीं तो
जान के लाले पड़ जायँगे। उसे एक सौ रुपये अपनी तरफ से
और देकर बिदा किया। लकड़हारे ने इतना रुपया कभी नहीं
देखा था। वह बीरबल के सामने उस बात को आजन्म गुप्त
रखने की प्रतिज्ञा कर खुशी २ अपने घर चला गया।
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बादशाह का नाखून
किसी देशके बादशाहका लड़ाईमें पैरका अँगूठा कट गया
था। उस बादशाह के पास बहुतेरे हकीम इसी कामके लिये
नियुक्त किये गये थे कि जब कोई लड़ाई में आहत होता तो
हकीम लोग उसका इलाज किया करते थे। हकीमों ने बादशाह के
अँगूठे पर फिर से मांस आ जाने का बहुतेरा प्रयास किया
जिससे मांस तो बढ़ आया परन्तु नाखून नहीं उगा। इसलिये
बादशाह हकीमों पर चिढ़कर उन्हें कैदकर लिया और विचारोंको
जेलमें बन्द रहकर कैदकी यातना भुगतनी पड़ रही थी। बाद-
शाह इतना करके भी सन्तुष्ट नहीं हुआ। उसने बहुतेरे हकीमों को