अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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को छोड़कर बाहर चले जावो, नहीं तो बादशाह आपको भी
कैदकर मरवा डालेगा। बेगुनाह जान गँवाने से क्या लाभ।"
परन्तु बीरबल ने उनकी बातों पर कान नहीं किया। वह
बराबर अपना काम दत्तचित्त होकर करता ही रहा। क्रमशः यह
बात धीरे २ बादशाह के कानों तक पहुँची। वह तो बराबर
ऐसे हकीमों की फिराक में पड़ा ही रहता था। इसलिए
दूसरे ही दिन अपन' सिपाही भेजकर बीरबलको अपनी सभा
में बुलवा कर बोला-"हकीम जी ! मैंने आपका बड़ा नाम
सुना है, यदि आप मेरा भी कुछ भला करें तो मैं आपका बड़ा
उपकार मानूँगा। मेरे अँगूठे का नख लड़ाई में कट कर गिर
गया है। मैंने उसको फिर से उगाने के लिये बहुतेरे हकीम
और वैद्यों की दवाएँ की, पर कोई वैद्य अकृतकार्य नहीं हुए।
यदि आपकी औषधि से लाभ होगा तो मैं सदैव आपका
गुणगान करूँगा।
बीरबल बोला-"बेशक मैं आपका इलाज करूँगा, मुझे
इस रोग की दवा मालूम है। उसके लगाने से पाँच दिनों के
अन्तर्गत आपके नख फिर से उग आयेंगे। मेरे गुरु का इस
दवा पर बड़ा भरोसा है। उन्होंने मुझसे बतलाया था कि यह
दवा कभी व्यर्थ नहीं जा सकती। आप मेहरबानी करके मेरे
बतलाने के अनुसार दवाओं का संग्रह करा दीजिये। बाद-
शाह प्रसन्न होकर बोला-"हकीमजी ! मुझे अब तक बहुतेरे
हकीमों से पाला पड़ चुका है; परन्तु आपसा अपनी दवा में
दृढ़ता रखने वाला एक भी न मिला।" बीरबल बोला-"यदि
परमात्मा सहायक रहा तो मैं आपसे निश्चयपूर्वक कहता हूँ कि