अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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रखवा दिया। उन्होंने सोचा कि शायद रुपयों के प्रलोभन में
आकर स्वामीजी फेर में आ जावेंगे परन्तु वे न कुछ आशी-
र्वाद दिये और न रुपयों की तरफ देखा ही।
बादशाहको स्वामीजी की ऐसी निष्ठुरता सहन न हो सकी
और वे झल्ला कर बोले—"अरे ऐसे अज्ञानियों से माथापच्ची
करना मूर्खता है। यह तो कोई अज्ञानी है, जो मनुष्य होकर
भी पशुवत व्योहार करता है।" बादशाह रुपयों की थैली
उठवाकर बीरबलके घर भेजवा दिये। उनका कस्द था कि दिये
दानको फिर वापस नहीं लेते थे। वे सबभाँतिसे हारकर अपने
महल को चले गये। दर्बार उठने के पश्चात् फिर जब
बादशाह और बीरबल का एकान्त में समागम हुआ तो बाद-
शाह ने स्वामी के पास जाने से लेकर लौटने तक का सारा
समाचार कह सुनाया। अन्त में बादशाह ने कहा- "अच्छा
बीरबल ! यदि किसी को मूर्ख का सामना करना पड़े तो
उस समय क्या करना चाहिये।" बीरबल ने तत्काल उत्तर
दिया- "पृथिवी नाथ ! एकदम चुप रह जाना चाहिये।"
बादशाह को उल्टी तोहमत लगी। पहले उनका विचार
था- "इस प्रकार समझा कर बीरबल के गुरु का मूर्ख होना
साबित करूँगा। लेकिन उनकी उस आशा पर एकदम पानी
फिर गया। बीरबल ने उन्हें ही मूर्ख बना दिया। बादशाहने कहा-
"सन्यासी को मैंने इतनी दौलत देकर बहुतेरा चाहा कि उससे कुछ
वार्तालापकरूँ, परन्तु उसने धनका कुछ भी लालच नहीं किया
बल्कि उल्टे मुझको ही मूर्ख बना चुप रह गया। आज से कस्द
करता हूँ कि अब भविष्यमें जब कभी किसी महात्मा से मिलने