अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in contextतब बीरबल ने उसके सारे बदन में खाक मलकर कोपीन वस्त्र
पहनाया और हाथ में एक रुद्राक्ष की माला देकर मस्तक पर
कृत्रिम जटा बाँध दी। फिर उसे हनुमानजी के मन्दिर में एक
मृगचर्म पर बैठाकर आप बादशाह के पास पहुँचा। बादशाह
का दरबार उमरावों से ठसाठस भरा हुआ था। बीरबल ने हाथ
जोड़कर कहा—"पृथ्वीनाथ ! मेरे गुरुजी आये हुये हैं, आपके
विषय में बातें करने पर उन्होंने आपसे मिलना स्वीकार
किय है। परन्तु मुझे साथ जाने की मुमानियत करते हैं। यदि
इतने पर भी आपके साथ जाऊँगा तो वे मुझसे बहुत नाराज
होंगे। मुमकिन है कि चिढ़कर मुझे शाप भी दे दें। बादशाह ने
पूछा—"इस समय वे कहाँ ठहरे हुये हैं?" बीरबल ने उत्तर
दिया—"हनुमानजी के मन्दिर के बाहर की कोठरी में।"
बादशाह अपने दरबारियों को साथ लेकर बीरबल के गुरु से
मिलने गये। वहाँ पहुँचकर बड़े अदब से प्रणाम कर बाकायदे
उन के सामने बैठ गये और फिर पूछा—"भगवन् ! कृपाकर
आप अपना नाम तथा ठिकाना इस दास से बतलावें, मैं
इस कृपा के लिये आपका चिर कृतज्ञ बना रहूँगा।" स्वामी जी
तो पक्के गुरु के चेले थे। उन्होंने उनकी बातों का कुछ भी
उत्तर न देकर बराबर अपना माला घुमाते ही रहे। बादशाह
फिर बोले-"स्वामी जी ! मैं समस्त भारतवर्ष का अधिपति हूँ
मैं आपकी सारी इच्छाओं की पूर्ति कर सकता हूँ। यदि आपको
किसी बात की चाहना हो तो मुझसे कहें। परन्तु स्वामी
जी फिर भी कुछ न बोले बल्कि आँख उठाकर उनकी तरफ
देखा भी नहीं। तब बादशाह ने एक लाख का तोड़ा उनके सामने