Skip to content
SarvaKosh
अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

Page 22 of 292

Read in context
Page 22

अकबर बीरबल बिनोद २८
और क्या ! फुर्र ।
अकबर बादशाह को कहानी सुनने का बड़ा शौक था।
इसलिये वह कुछ चुने हुए दरबारियों की ऐसी पारी बाँध
रक्खी थी जो अपनी अपनी पारी पर रात्रि में बादशाह के
मनोरंजनार्थ नित्य नवीन नवीन कहानियाँ सुनाया करते थे ।
एक दिन बीरबलकी बारी आई । यथा समय कहानी शुरू हुई।
बादशाह हुँकारी भरने लगा। इस प्रकार बीरबल को कहानी
कहने में बड़ी तकलोफ होती थी कारण की वादशाह बड़ी से
बड़ी कहानी सुनना चाहता था। जब बीरबल एक सम्पूर्ण
वाक्य कह जाता तब बादशाह केवल 'और' कह कर ही
छुट्टी पा जाता था। छोटी मोटी कहानियों से बादशाह को
सन्तोष नहीं होता था। वह हमेशा बड़ी से बड़ी कहानियाँ
सुनने की फिराक में रहता था ।
बीरबल को कहानी सुनाते बहुत रात व्यतीत हो गई
फिर भी बादशाह से फुरसत मिलने की कोई आशा न
दिखाई पड़ी, वह झल्ला उठा और अपने मन में सोचा-‘जो
कुछ भी परिश्रम है; वह मेरे को है, बादशाह तो केवल एक
शब्द कह कर फुरसत पा जाते हैं इसलिये अब कोई ऐसी
तरकीब सोचनी चाहिये जिससे बादशाह भी झल्ला उठें ।'
वह अपनी प्रखर बुद्धिके कारण तुरत एक ऐसी ही तरकीब ढूँढ़
निकाली और उसी के अनुसार दूसरी कहानी शुरू की-‘‘एक
धनिक किसान ने अपने अन्न को सुरक्षित रखने के लिये एक
कोठलीं बनवा रक्खी थी, उसमें अनाज भर कर उसके मुँह