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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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६ अकबर बीरबल बिनोद
पर ढक्कन रखकर उसे भलीभाँति बन्द कर दिया, यहाँ तक
कि उसमें हवा आने जाने तक की जगह भी नहीं छूटी थी ।
विधना का विधान कठिन होता है, दैवात उस कोठली में
एक छोटा सा छिद्र छूट गया था जिसके द्वारा एक छोटी
चिड़िया उस कोठली में घुस गई और एक दाना अपनी चोंच
में लेकर बाहर निकल आई और 'फुर्र' उड़ गई। फिर दूसरी
चिड़िया घुसी और अपना भाग लेकर 'फुर्र' उड़ गई । फिर
तीसरी चिड़िया आई और भीतर गई, अपना दाना लेकर
'फुर्र' उड़गई । फिर एक चिड़िया आई, भीतर घुसी अपना
दाना लेकर 'फुर्र' उड़ गई, फिर और एक चिड़िया आई और
भीतर घुसकर अपना दाना लेकर 'फुर्र' उड़ गई । इसी तरह
लगातार कहते कहते बीरबल को सैकड़ों बार हो गया जब
बादशाह और और कहता कहता थक गया तो भुँझला कर
बीरबल से बोला- "यह तो मैं सुन चुका, अब आगे क्या हुआ
सो कहो । बीरबल ने गम्भीरता से उत्तर दिया- "पृथ्वी-
नाथ ! दाने के लोभ से वहाँ पर चिड़ियों का जमघट लग
गया यहाँ तक कि वहाँ करोड़ों चिड़ियाँ इकट्ठी हो गईं और
अपना अपना दाना बारी बारी से लेकर जाने आने लगीं ।
अभी सौ पचास की ही बारी आई है, जब सब चिड़ियों का
पेटभर जायगा तो कहानी आगे चलेगी। क्या अभी खतम हुआ
जाता है । इसमें वर्षों का समय लगेगा । बादशाह बोला- "मैं
ऐसी कहानी से भर पाया अब इसे यहीं बन्द करो।"
बीरबल को अवकाश मिल गया वह मनही मन गाजता हुआ
वहाँ से प्रस्थान किया ।