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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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७ Akbar Birbal Binod / अकबर बीरबल बिनोद

अशर्फी आपका मूल्य है और यही श्रीमान् का वजन है। यह
अन्य अशर्फियों से एक रत्ती बड़ी है, इस कारण इसके समान
दूसरी अशर्फी नहीं है। पृथिवीनाथ ! हम प्रजागण साधारण
अशर्फी हैं और आप इस बड़ी अशर्फी के समान हैं।
बादशाह ने पूछा-"तो क्या मुझमें और अन्य दूसरे मनु-
ष्यों में केवल एक रत्ती का ही अन्तर है ?" शर्फ़ों का
मुखिया बोला-"जी हाँ, गरीबपरवर ! इसमें कुछ भी
सन्देह करने की बात नहीं है। आप में और आपकी प्रजा
में केवल इतना ही अन्तर है कि प्रजा आपके आधीन
रहने के लिये बनाई गयी है और आप प्रजा को अपने आधीन
रखने के लिये हैं। आप प्रजाओं में जिस प्रकार बड़े समझे
जाते हैं उसी प्रकार यह अशर्फी भी अन्य अशर्फियों में श्रेष्ठ
साबित हुई है। आपके बैठने को ऊँचा आसन मिलता है
और प्रजावर्ग को बैठने के लिये नीचा आसन दिया
जाता है। इन्हीं सब कारणों से निश्चित हुआ कि यही
अशर्फी आपका मूल्य है।"
जौहरी की उपरोक्त युक्तिभरी वार्ता सुन बादशाह गद-
गद हो गया और उसको उसके साथियों सहित अच्छा
पुरस्कार देने की आज्ञा दी। जौहरी का मुखिया पुरस्कार
पाकर मनही मन बीरबल को आशीर्वाद देता हुआ अपनी
मण्डली के सहित नगर को चला गया और सभा भंग हुई।